शनिवार, 21 सितंबर 2013

तुम ऑर मैं !

 
 
 
 
 
मेरे माधव !
यूँ मुझमे सामाये हो तुम
की होश नहीं ,
मैं तुम हूँ की तुम मैं
रागिनी हूँ मैं पीया तुम्हारी
धर लो न अधरों पे मुझे रागिनी हूँ
रंग में रंग के देख तो लो मन बसिया
तुम जेसा सच्चा कोई नहीं
तुम जिसा निष्पाप कोई नहीं
दुनिया कहे तुम्हे कहे छलिया
कौन जाने इसके पीछे
कितनी अबलाओं को तुमने अपना नाम दिया ....
सम्हाला दुनिया को जीवन का सांचा मार्ग दिया
जो किया कभी छिपा के नहीं
दुनिया के सामने किया
इसलिए तो तुम कहलाओ पगले छलियाँ
तुम छलिया नहीं सांचे मानव हो
जिसने सबको अपना नाम दिया
जिसने जिस रूप में तुम्हे पुकारा
तुमने उसे थाम लिया ..
मुझे भी यूँ ही थामे रहियो मेरे सर्वेश्वर 
मेरे राम .!
तुम्हारी चरण दासी अनुभूति

मैं इन्तजार करुँगी !

 
 मित्रों मेरी एक कविता एक मंच से
 ओ माहे रूह !
मेरे हमदम !
मेरे हमराज !
यूँ स्तब्ध सी मैं तुम्हे जाते देखती ही रह गयी
विवश थी मैं सोचती ही रह गयी जिंदगी से ऐसी क्या खता हो गयी |

तुम मौन थे सदा से ऑर मैं खिखिलाती धुप
कभी नहीं कहते थे मन की बात फिर भी मन में महक रहे थे बन के मधुप |

टूट के मेने तुम्हे चाहा ,लेकिन तुम फिर भी न मुझे समझ सके
दुनिया के ताने -बाने में उलझे तुम मुझसे बिना कुछ कहे फिर रूठ चले |

मैं इन्तजार करुँगी सदा की तरह की तुम लौट आओ
महकते मधुप बनकर फिर मेरा सूना जीवन सजाओ ....|

अनुभूति