रविवार, 16 जून 2013

अनुरंजनी हूँ तुम्हारी कृष्णा !

हे मधुसुदन !
हे घनश्याम !
भोर की वेला में भी अँखियाँ बहाती हैं नेह नीर
तुम जन्हा हो गिरधर
स्वीकारो
ओ बैकुंठ के स्वामी ये आँखों से बहती प्रीत
आत्मा के अंतिम छोर पे बस गए हो
दुनिया के स्वार्थो से परे   
बन रूह का सिंदूरी सूरज ......
में साथ हूँ तुम्हारे उन चरणों के
जनम से ही ,
जनम नाम लक्ष्मी  
में  चरण संगिनी हूँ माधव तुम्हारी ...
केसे छोड़ दूंगी में तुम्हे पीया बसंती
मेरी रूह के रंग रेज
रंगी हूँ में तुम्हारे ही रंग
अनुरंजनी हूँ तुम्हारी
स्वीकारो
मेरे सरल सीधे माधव
भोर का ये स्नेह अश्रु प्रक्षालन ...........
कृष्ण परिणीता अनुभूति