शनिवार, 21 सितंबर 2013

तुम ऑर मैं !

 
 
 
 
 
मेरे माधव !
यूँ मुझमे सामाये हो तुम
की होश नहीं ,
मैं तुम हूँ की तुम मैं
रागिनी हूँ मैं पीया तुम्हारी
धर लो न अधरों पे मुझे रागिनी हूँ
रंग में रंग के देख तो लो मन बसिया
तुम जेसा सच्चा कोई नहीं
तुम जिसा निष्पाप कोई नहीं
दुनिया कहे तुम्हे कहे छलिया
कौन जाने इसके पीछे
कितनी अबलाओं को तुमने अपना नाम दिया ....
सम्हाला दुनिया को जीवन का सांचा मार्ग दिया
जो किया कभी छिपा के नहीं
दुनिया के सामने किया
इसलिए तो तुम कहलाओ पगले छलियाँ
तुम छलिया नहीं सांचे मानव हो
जिसने सबको अपना नाम दिया
जिसने जिस रूप में तुम्हे पुकारा
तुमने उसे थाम लिया ..
मुझे भी यूँ ही थामे रहियो मेरे सर्वेश्वर 
मेरे राम .!
तुम्हारी चरण दासी अनुभूति

4 टिप्‍पणियां:

अरुन शर्मा अनन्त ने कहा…

नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (22-09-2013) के चर्चामंच - 1376 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

sanny chauhan ने कहा…

बहुत सुन्दर पोस्ट

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Yogesh Sarwad ने कहा…

दीदी,
बहुत सुन्दर रचना

jyoti khare ने कहा…

तुम छलिया नहीं सांचे मानव हो
जिसने सबको अपना नाम दिया
जिसने जिस रूप में तुम्हे पुकारा
तुमने उसे थाम लिया ..
मुझे भी यूँ ही थामे रहियो मेरे सर्वेश्वर
मेरे राम .!--------

वाह मन को छूती अदभुत अनभूति
बहुत सुंदर----

सादर----

आग्रह है मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों.… आभार
http://jyoti-khare.blogspot.in