रविवार, 15 सितंबर 2013

मनु






मेरे माधव !
मेरी आत्मा में बसे मनु हो तुम
प्रलय के बाद शांत बेठे उसी चटान पे
अपने में खोये
और में तुम्हे अपक निहारती
तुम्हारे अन्तस् की तन्हाई को
तुम कभी बंसी की धुन में बहलाते हो
तो कभी गीता का कर्म ज्ञान देते हो ....
मेरे सरल सीधे से पीया
ये क्यों नहीं कहते तुम
मेरी ही तरह
अपनी पीया की बाहों में टूट के बिखर जाना चाहते हो तुम
काहे रास रचाने के नाम पे अपने मन को बहलाते हो
टूटे- टूटे से हो ,,अन्तस् से बिखरे -बिखरे से हो
तो फिर पीया
अधरों पे बसी धर अपनी स्वप्न संगिनी को यथार्थ में बुलाते क्यों नहीं .......
वो कोई एक तो होगी न कृष्णा तुम्हारे लिए
जो बनी होगी हर श्वास
प्रियतम
सिर्फ तुम्हारी रूहे सुकून के लिए ...........श्री चरणों में अनुभूति

9 टिप्‍पणियां:

सरिता भाटिया ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
चर्चामंच 1370 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर
सरिता भाटिया

Asha Saxena ने कहा…

उम्दा रसमय रचना पढ़ना अच्छा लगा| बधाई |

Laxman Bishnoi ने कहा…

बेहतरीन रचना
???? ?? ??????????

अरुन शर्मा अनन्त ने कहा…

नमस्कार आपकी यह रचना आज सोमवार (16-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

कालीपद प्रसाद ने कहा…


बहुत सुन्दर रचना !
latest post कानून और दंड
atest post गुरु वन्दना (रुबाइयाँ)

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

दिगम्बर नासवा ने कहा…

माधव वैसे ही बस्ते हैं सबके मन में .. जैसा जो चाहता है ... सुन्दर भावमय रचना ...

राजेंद्र कुमार ने कहा…

कृष्ण प्रेम और समर्पण की सुन्दर प्रस्तुती,धन्यबाद आदरेया।

संजय भास्‍कर ने कहा…

खुबसूरत रचना !!