शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

मेरे कृष्णा ! तुम सिर्फ निस्वार्थ स्नेह हो .......

         तुम एक रूप तुम्हारे अनेक
हर रूप में तुम दिव्य हो ,अद्भुत हो
संसार का हर मानव तुम्हे पूजे ,
पुकारे अपने अपने नाम .....
कोई कहे राम ,तो कोई कहे कृष्णा ,,,
कोई कहे खुदा ,तो कोई रब ..कोई कहे परमपिता ..
तो कहे मेरे इशु तुम
तुम सभी में समाये हो ..
मेने तुम्हे कण-कण में पाया
हर मानव के स्नेह में पाया
तुम बस एक हो स्नेह हाँ ,,,,,,
तुम्हारी परिभाषा सिर्फ इतनी हैं .....तुम हो निस्वार्थ स्नेह ,,,,,,,,मानव का .....
इस तुच्छ मानव का स्नेह चरणों में स्वीकारो
मेरे गिरधर !
मेरे गोविन्द !
मेरे राम !
मेरे अल्लाह !
मेरे रब !
मेरे इशु !......हर तरफ खिली इन मुस्कानों में तुम ही हो ......
हर बच्चे की मुस्कान में ..
हर आंसू में गिरती हैं तुम्हारी ही छबी ,,,,,
फिर में कन्हा खोजने जाऊं
मंदिर या गुरु द्वारे ,,,,,
मेने तुम्हे पाया ...
अपने ही अंतस के धाम ...
अपने स्नेह में मेरे राम ......
अनवरत स्नेह की ये गंगा तुम्हारे चरण पखारति रहे .......जीवन की इसी मंगलकामना के साथ ...श्री चरणों में चरण प्रक्षालन स्वीकारो मेरे माधव !

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