शनिवार, 15 जून 2013

तन बिकते मिटटी के मोल

 
   मेरे माधव ! 
मेरे पीया १
मेरे ठाकुर ! 
जो कुछ मेरा हैं सब हैं तुम्हरा 
में तो सदा से अज्ञानी 
ज्ञान हैं तुम्हारी वाणी 
जो तुमने कह डाला मेने कर डाला 
जो तुमने दिया मेने स्वीकार किया 
मुझे समझ न आई कभी जीवन की काहानी 
तन बिकते मिटटी के मोल 
यंहा कोई नहीं रूह का खरीदार 
एक तुम्हे ही पाया मेने जगत विधाता 
इसलिए सर्वस्व तुम्हे अर्पण कर डाला 
क्या पाना ?
क्या खोना ?
इन सबसे मेरा न अब कोई दूर का नाता 
जिसने दिया जीवन उसकी की चरणों में सबकुछ अर्पण मेने किया ]
अहंकार{ये अन्तस् का में }भी अर्पण 
तो क्या अब मेरा तेरा 
में पगली तू न जाना  रे ,,माधव 
इसलिए उलाहना ये दे डाला .........
तुम जब छोड़ गए थे गोकुल 
तुम्हारी ही रज कण मस्तक पे लगा मेने ये जीवन सम्हाला 
कितने सारे आते रहे तूफ़ान 
पर मेने तुम्ही में अपना सब कुछ पा लिया .
हंसना ,
गाना रोना 
छेड़ना तुम्हे
सोलह सिंगार तुम्ही से कहना ,लजा जाना  .
अपने ममत्व  की प्यास
तुम्ही से हैं कायम
स्नेह और श्रद्धा की रीत सदा से |
छिनना ,पाना नहीं स्नेह की रीत 
तुम क्या जानो !कृष्णा 
इस जगत आतम त्रान की केसी हैं मानवो की रीत
 श्री चरणों में अनुभूति ..

1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और सुन्दर प्रस्तुती ,धन्यबाद।