बुधवार, 19 जून 2013

अबोध स्नेह

अबोध स्नेह 
नहीं जानता वो स्नेह की परिभाषा 
इतना ही कहा करता हैं 
बहुत गहरी हो तुम ,बिन कहे भी बहुत कुछ कहती हो 
तुम खामोश रहो फिर भी तुम्हारी ये आँखे बहुत कुछ कहती हैं |
उसके अबोध स्नेह पे में मुस्का देती हूँ !
नहीं मालुम उसे जिस स्नेह की डगर ,उसे मुस्का के उसी से छुपा देती हूँ |
ये महाआनंद का सागर हैं तो दर्द का तूफ़ान भी 
केसे तुझे समझाऊं प्रिय 
इसकी आहुति में सब कुछ भेट चढ़ता हैं ...
लेकिन पाने को कुछ नहीं खोने को सब कुछ हैं ,,,,,इसलिए तुम इन नैनों की नहीं ,इस नश्वर तन की नहीं 
तारीफ़ करो 
उस ईश्वर की जो खाली पड़े बांस में भी 
गूंज पैदा करता हैं मधुर सुरों की .....
ये नयन ,ये जीवन अब आमानत हैं उसी माधव की 
जो किसी एक का नहीं सबका हैं 
उसके रुदय में हैं तड़प पत्थर होती औरत के मन की भी 
रुदन करते भूख से बिलखते बालक की भी 
और क्रोध भी हैं दुराचार करते कंस जेसे इंसानों के खिलाफ |
तुम नहीं समझ सकोगे अभी स्नेह की परिभाषा 
क्योकि तुम उलझे हो अभी भी जुल्फों के पेचों में 
नयनो की गहराई में 
में नहीं ,प्रिय 
वो मृगनयनी 
वो कोई और होगी 
वो कोई और होगी .....
क्योकि में परिणीता हूँ उस जगत के पालनहार अपने विष्णु 
हां जन्मो से ही अपने नाम के साथ दासी हूँ उसके कदमो की ,,,,,,
तुम्हारी नहीं किसी और की हूँ में 
ओ अबोध स्नेह .......
ईश्वर दे तुम्हे कोई और मृगनयनी 
इसी सुन्दर कामना के साथ .....
कृष्ण परिणीता अनुभूति

रविवार, 16 जून 2013

अनुरंजनी हूँ तुम्हारी कृष्णा !

हे मधुसुदन !
हे घनश्याम !
भोर की वेला में भी अँखियाँ बहाती हैं नेह नीर
तुम जन्हा हो गिरधर
स्वीकारो
ओ बैकुंठ के स्वामी ये आँखों से बहती प्रीत
आत्मा के अंतिम छोर पे बस गए हो
दुनिया के स्वार्थो से परे   
बन रूह का सिंदूरी सूरज ......
में साथ हूँ तुम्हारे उन चरणों के
जनम से ही ,
जनम नाम लक्ष्मी  
में  चरण संगिनी हूँ माधव तुम्हारी ...
केसे छोड़ दूंगी में तुम्हे पीया बसंती
मेरी रूह के रंग रेज
रंगी हूँ में तुम्हारे ही रंग
अनुरंजनी हूँ तुम्हारी
स्वीकारो
मेरे सरल सीधे माधव
भोर का ये स्नेह अश्रु प्रक्षालन ...........
कृष्ण परिणीता अनुभूति

शनिवार, 15 जून 2013

तन बिकते मिटटी के मोल

 
   मेरे माधव ! 
मेरे पीया १
मेरे ठाकुर ! 
जो कुछ मेरा हैं सब हैं तुम्हरा 
में तो सदा से अज्ञानी 
ज्ञान हैं तुम्हारी वाणी 
जो तुमने कह डाला मेने कर डाला 
जो तुमने दिया मेने स्वीकार किया 
मुझे समझ न आई कभी जीवन की काहानी 
तन बिकते मिटटी के मोल 
यंहा कोई नहीं रूह का खरीदार 
एक तुम्हे ही पाया मेने जगत विधाता 
इसलिए सर्वस्व तुम्हे अर्पण कर डाला 
क्या पाना ?
क्या खोना ?
इन सबसे मेरा न अब कोई दूर का नाता 
जिसने दिया जीवन उसकी की चरणों में सबकुछ अर्पण मेने किया ]
अहंकार{ये अन्तस् का में }भी अर्पण 
तो क्या अब मेरा तेरा 
में पगली तू न जाना  रे ,,माधव 
इसलिए उलाहना ये दे डाला .........
तुम जब छोड़ गए थे गोकुल 
तुम्हारी ही रज कण मस्तक पे लगा मेने ये जीवन सम्हाला 
कितने सारे आते रहे तूफ़ान 
पर मेने तुम्ही में अपना सब कुछ पा लिया .
हंसना ,
गाना रोना 
छेड़ना तुम्हे
सोलह सिंगार तुम्ही से कहना ,लजा जाना  .
अपने ममत्व  की प्यास
तुम्ही से हैं कायम
स्नेह और श्रद्धा की रीत सदा से |
छिनना ,पाना नहीं स्नेह की रीत 
तुम क्या जानो !कृष्णा 
इस जगत आतम त्रान की केसी हैं मानवो की रीत
 श्री चरणों में अनुभूति ..

शुक्रवार, 14 जून 2013

विराट ह्रदय के स्वामी ....मेरे माधव !

                                             
                                             

                                       हे मधुसूदन !
हे गोविन्द !
तुम ही थे 
जिसने दी थी मीरा को विष प्याला पिने कीशक्ति 
तुम्ही थे न जिसने हजारों अबलाओं को दे मुक्ति 
बनाया था अपनी परिणीता 
हां माधव !
वो तुम ही थे 
एक विराट रूप ,
विराट ह्रदय के स्वामी 
जिसके ह्रदय में बसा था 
राधा संग बावरी गोपियन का प्यार 
काश तुम एक बार फिर आ पाते 
एक बार फिर 
इस धरती को पावन कर जाते ....कृष्णा तुम्ही तो कहते हो 
मैं हर बार जनम लिया करता हूँ दुनिया को मार्ग दिखाने 
महापुरुषों  ,संतो ,मनस्वियों के रूप में,,,,
पर  तुम खुद क्यों नहीं आते ,कृष्णा...........
जीवन  के इस भव सागर में ,
चले आओ न
जीवन के इस आत्मत्राण को सहने की तुम शक्ति दो 
प्रभु ! 
मुझे अपनी भक्ति दो
प्रभु ह्रदय के बिखरे तारों को फिर वीणा में जुड़ने की शक्ति दो ,,,,,,
विदीर्ण हैं रुदय का आकाश 
इस पे तुम अपने विराट रूप को देखने की शक्ति दो ,,,,,,
मुक्त करो इस अन्धकार से 
ले आओ फिर उजाला ,,,,,,
फहरा दो तुम एक बार फिर सिंदूरी पीताम्बर ,,,,,,,,,,
के  सूना ये मन का आकाश हो जाए फिर सिंदूरी ,,,,,,
चले आओ न माधव !
एक बार फिर तुम 
पलके राह बुहारती हैं 
श्री चरणों में सुनी सी अनुभुति तुम्हे पुकारती हैं |
जन्हा हो स्वीकारो बैकुंठ स्वामी 
इस अभागी 
अनुभूति का ये नेह नीर चरण प्रक्षालन |
श्री चरणों में अनुभुति