मंगलवार, 8 जनवरी 2013

तुम्हारी माया तुम ही जानो !


मेरे गिरिधर !
मेरे राम !
ये कैसी लगी हैं तुझसे स्नेह की रीत 
न जानू में आँखों से बहती ये प्रीत 
काहे सजा दिए जाते हो पल-पल 
एक सीधे साधे इंसान को रूप बदल सताते हो ,
तुम्हारी माया तुम ही जानो 
मैं जानू आत्मा के समर्पण की रीत 
मोह नहीं इस संसार कोई 
न ही निभानी हैं इस दुनिया की कोई रीत 
इतना ही मांगा था मेने तुमसे 
सदा मुझे अपने चरणों में रहने देना 
इतनी सी बात की में नहीं अधिकारी 
तो क्या करुँगी ,लेके ये जीवन भारी 
मेरे कृष्णा !
बस यूँ ही नीर बहाते- बहाते
निकल जाए ,तुम्हारे उन गुलाबी चरणों में मेरे प्राण 
एक अंतिम विनती ,
एक अंतिम पुकार 
इस आत्मा की तुम सुनना 
जिस बैकुंठ में तुम 
अपने चरणों की सेवा देना 
जो लक्ष्मी नाम तुमने मोहे जनम दिया 
इस जीवन नहीं ,मृत्यु बाद मुझे बस ये एक सुख देना 
भ्रम ही भ्रम हैं इस संसार 
कही नहीं सत्य जगत का अक्ष्णु आधार 
एक बार फिर चले आओ 
इस संसार की धरती पे बन के 
मेरे राम !
 नहीं तो ये श्वासे 
तुम्हे पुकारती -पुकारती 
अपनी ही तबाही का आलम खुद लिखलेंगी 
अब वक्त हैं बहुत ही कम 
चले आना तुम ,
जिस तरह आये थे शबरी के के पास
चले आना तुम चले आना तुम 
मेरे राम !
सत्य कही न मेरा टूट जाए 
ये जीवन ज्योति 
ये भक्ति मेरी 
कही तुम्हरे चरणों में आने से पहले धुल न हो जाए 
या तो तुम चले आना 
नहीं तो इन श्वासों को बुला लेना 
तुम अपने धाम ....मेरे राम !
एक तुम ही हो सत्य 
इतना ही जानता हैं ये भोला मन 
या तो विलीन  करो मूझे अपने चरणों में 
या विराट रूप धर मोहे 
इन अंधेरों में मार्ग दिखाओ 
मेरा पथ जीवन नहीं 
तेरी ही साधना हैं मेरे राम 
दिन रैन ,श्वास श्वास .रोम-रोम 
इस आत्मा के कण-कण में तुम ही बसे हो मेरे राम !
केसे तुम्हे निकाल हदय से 
एक पल जी पाऊं 
केसे तुमको ओ राजीव नयन 
ये बावरा मन दिखलाऊं 
मेरी मुक्ति का मार्ग दिखाओ मुझे मेरे प्रभु !
 जिस  दुनिया में हो जानकी नाथ !
जो सोचा अहितभी स्वप्न में किसीका
तो संसार की कठोर सजा की त्रास 
तुम मुझे देना 
दुनिया की सारा दर्द ,वेदनाये तुम मुझे देना 
ये मुस्काते -मुस्काते 
मुझे स्वीकार हैं 
पर अंतिम एक सत्य वचन तुम मुझे देना 
मेरी मृत्यु के सामने 
इन नयनो की प्यास बुझाने 
तुम ही खड़े रहना !
तुम बिन मेरी मुक्ति नहीं हो पाएगी 
मेरे राम !
श्री चरणों में स्वीकार करो 
नीर बाहते इन नयनो का आत्मीय प्रणाम 






1 टिप्पणी:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर
क्या कहने