मंगलवार, 20 मार्च 2012

अब तो कृपा करो गिरिधर





! प़ियाबसंती
मेरीरूहकेरंगरेज
रंगेहोधानी ,पीली ,लालचूड़ियोंसे
मेरेमनकाआँगन
मनकेमनुभीतुम
घोरतपस्वीभीतुम
उतरकेइसधरतीपेचलेआयेवोकामदेवभीतुम
हांतुमहीतुमहोमाधवजीवनकेहरनशेमे
हरसुगंधमें ,हरपुष्पमेंहरबयारमें
प़ियाफिरभीमोहेतुमसतायाकरतेहो
अपनीहीहटदिखायाकरतेहो
देखोश्याम !
जिसदिनमेंरूठगयी
,तुममोहेमनाभीनहींपाओगे
जोतुमबनगएयोगीश्वरतोमेंभीयोगिनीतुम्हारी
होतुमतपस्वी ,तोमेरातपभोतुम
गिरिधर ! गोविन्द !
अबचुपमतबेठोतुम
नहींतोमेखूबसताउंगीतोहे
भर -भरधानीचूड़ियोंवालेहाथ
बंसीले ,दूरभागजाउंगीमें
तुमसुनातेहोकोईधुनअपनेअधरोंपेरखस्नेहकीबंसीकी
मेंरूठजाऊंतुमसे
मेरेश्याम !
तुमसेनहींहमअसाधारण

जोयोगीभीबनजाएएकपलमेंऔरभोगीभी
तुम -तुमहीहोजगदीश्वर
अबतोकृपाकरोगिरिधर

नहींतोयेफूलोसेमहकीरातयूँहीढलजायेगी
औरयेपगलीतुम्हारी
राधा ,बंसीकीधुनसुनेबिनाहीरोते -रोतेहीसोजायेगी ,,,,,,,,,,,,,
श्रीचरणोंमेंअनुभूति