रविवार, 9 दिसंबर 2012

ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !

                             

Photo: मेरे ठाकुर ! 
मेरे राम ! 
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं 
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम 
केसी हैं विपदा ये 
तुम ही जानो श्याम 
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक 
घड़ी हैं कैसी अजीब 
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन 
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ
मेरे ठाकुर !
मेरे राम !
कित छिपे हो घनश्याम ,
मन तडपे हैं
पुकारे हैं बस राम ,राम ,राम
केसी हैं विपदा ये
तुम ही जानो श्याम
ओ मन बसिया ,
श्वासों के मालिक
घड़ी हैं कैसी अजीब
बिन तुम्हारे ,न सुलझे उलझन
ओ मेरे कोस्तुभ स्वामी !
ओ मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति ....की पुकार सुन भी लीजो मेरे जानकीनाथ

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
। लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी है!
सूचनार्थ!

Girish Billore ने कहा…

adabhut