सोमवार, 27 अगस्त 2012

मेरे दिलकश महबूब




ऐ जिंदगी  !
तू मुस्कुराते हुए ,मुझे अब ज़रा थाम ले 
महकती इन फिजाओं में 
मेरी इस प्यासी रूह कों 
अपनी मोहब्बत का जाम दे 
ऐ  कायनात !
रोशन हैं मेरी राहे ,
मेरे खुदा ! 
तेरी इबादत और मोहब्बत के नूर से 
अब बता क्यों न हो की ,
मेरे दिलकश महबूब !
तू भी मुस्कुराके मुझे अपनी इन बाहों में थाम ले ।

Anubhuti

1 टिप्पणी:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर
क्या कहने