गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कँहा बन सकती हूँ में एक बादल !




ये  
खुला नीला आकाश ,
जेसे कह रहा हो मुझे,
 बह जाओ तुम अनु एक बार फिर इन फिजाओं में 
और में वक्त को थामे ,
इसी नीले आकाश में खोजा करती हूँ तुम्हे 
लेकिन तुम तो बादलो की तरह न जाने कितने रूपों में बदल गए 
और में खोजती ही रही इस नीले आकाश में तुम्हे 
दिल तो करता हैं में भी तुम्हारी तरह नीला ,सफ़ेद बादल बन जाऊं 
लेकिन फिर अपने को थामती समझाती हूँ 
की मुझमे और इस बादल में बहुत फर्क हैं 
ये में नहीं हो सकता 
क्योकि में तो सिर्फ एक हूँ 
अंदर बाहर से एक ,हां एक नदी ,,,,,,,,,,,,,,
कँहा  बन सकती हूँ में एक बादल 
तुम तो उड़ जाया करते हो पलक झपकते ही ,
एक पल में ही खोजती रहती हैं मेरी आँखे तुम्हे 
और तुम कभी नीले तो कभी सफ़ेद हो जाया करते हो 
और में खोजा करती हूँ तुम्हे इस नीले आकाश में ......................
तुम्हे अब नहीं खोजूंगी में कभी नीले बादलो में 
क्योकि अब तुम इन बादलो से आँखों से उतरे रूह में समा चुके हो 
अब नहीं बदल सकोगे कोई रंग तुम 
क्योकि अब कैद हो तुम अब मेरी इन साँसों में 
अब मे नहीं खोजूंगी तुम खोजा करोगे अल्हड,  उस नदी को 
जिसमे हर पल सिर्फ तुम्हारे ही अक्स दिखा करते थे 
जब तक शांत होकर स्नेह समर्पण करता रहा ,तुम दीखते रहे ,झांखते रहे 
अपने ही अक्स को अपनी ही रूह को खोजा किये तुम मुझमे ,
जानते हो क्यों ? 
क्योकि में निर्मल सरिता हूँ जो कभी अपना रंग नहीं बदला करती 
वो बदलती हैं अपना वेग ,अपनी दिशाएं ,अपनी राहे 
और वो पलटती नहीं कभी पीछे की और कभी वो सिर्फ बहा करती हैं 
और तुम सदा से अपना ही भविष्य ,
अपना ही रूप रंग देखने को तरसा किया करते हो उसकी निर्मलता में 
क्यों नहीं समझ सकते आत्मा की इस निर्मलता को ?
ये ही सवाल अपनी साँसों में समाये 
तुम्हारे कभी धवल ,कभी नीले तो कभी श्यामल रूपों को अपनी आत्मा में बसाए 
बह चली हैं तुम्हारी सरिता ,अपने अंत हीन सफर पे 
तुम्हे इन साँसों में संजोये ,अपनी आत्मा का सर्वस्व तुम्हे अर्पित किये 
तुम्हारे पग पखारते ,तुम्हे मुस्काते  देख 
चल पड़ी हैं सरिता अपने सागर से मिलन को ......................................
अनुभूति  
 
 

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