सोमवार, 23 जुलाई 2012

हे शिव !अपनी सती का इस जनम भी साथ निभाओ ................



 ओ प्रलयंकर !
देखती  हूँ क्रोध आप का 
तो कॉप जाती हैं सृष्टि सारी .
हो अविनाशी ! 
अखंड !
महाकाल!
विचित्र रूप हैं आप के प्रभु !
एक तरफ क्रोध हैं भारी ,प्रलयंकर आप का
दूसरी तरफ विष पी दे दिए हो 
सबको अमृत का वरदान भारी 
 तुम्हारी महिमा हैं न कभी जा सकनेवाली बखानी 
कभी हो इतने भोले भंडारी 
के दो राक्षसों को भी दे वरदान बलिहारी 
अपनी सती के हो प्यारे 
कितने जनम तुमने उसे तपाया 
एक  मासूम कन्या को सती बनाया 
विष्णु  शरण को छोड तुमने उसे अपना रूप सरल दिखाया 
वो  नारी तो जान ही न पाई ,
उसने एक पल में इस योगी में जो  पाया 
त्यागे  उसने पर्वत राज के महलचोबारे 
जो तुम्हे अपना मान ,मस्तक पे ये सिंदूर लगाया 
कितनी बार स्वाहा होते देखा है 
अपना ही स्नेह को  तुमने .
ओ योगीश्वर !
सब  कुछ  देख भी अनजान बने रहे सदा तुम 
बनके एक हठ साधक ,
एक हिमालय के योगी !
तुमने प्रीत सिखा के एक कंचन काया को 
कंटक का मार्ग दिखाया ...........
पता नहीं उसने कितने जन्मो में तुम्हे पाया 
में जानती हूँ तुम्हे करना था निभाना था 
इस सृष्टि का एक बड़ा काम ..................
इसीलिए  तुमने अपनी सती को तपाया 
अपनी  ही तरह एक रानी से 
योगिनी बनाया ,,,,,,,
तुम्हे जो करना हैं इस दुनिया में एक अलग ही काम 
में जानती हूँ प्रलयंकर !
इसिलए  जीवन को तुमने ऐसा बनाया 
सूना हैं मेने जीवन एक परिष्कृत मस्तिष्क द्वारा बनाई कहानी हैं 
हां इस गणेश की उत्पत्ति होनी हैं 
इसीलिए तुमने
हे विष्णु !
ये अद्भुत ,अनुपम 
लीला रचाई हैं 
मेरी आँखे देख रही हैं ये सारे होने वाले नव सृजन 
कितने अद्भुत हैं होने वाले ये अनुपम मिलन 
कितना अद्भुत होने वाला हैं 
धन्य हूँ !
में जो इतना सबमेने देखा हैं और देखने वाली हूँ 
हिस्सा हूँ तुम्हारी लीलाओ का 
ओ प्रलयंकर !
कितने रूपों के दर्शन आत्मा नित करती हैं तुम्हारे 
सदा  मुझे यूँ ही दिखाए रखना मार्ग 
और जिवंत रखना अपने असीम स्नेह कीअनुभूति 
ओ गंगाधर !
मै देखू  जब तोहरे हदय की विशालता 
तो ,देखू तुम होठो से लगा के विष प्याला हंस के पि जाओ 
लेकिन आत्मा की ये अनुभूति कभी किसे न कराओ 
प्रसन्न हो सब सह के बन के एक योगी 
धन्य हूँ!
 जो मेरी आत्मा ने की हैं तुम्हारी भक्ति
कभी तुम्हे मान अपना राम ,तो कभी एक हठ योगी 
जन्मो -जन्मो की तपस्या के बाद आत्मा कभी ऐसा सुख पाती है 
बलि हारी हूँ !
इतने विष के बाद भी 
तुम्हारी एक सजती मुस्कान पे अपना सब कुछ वारि हूँ !
हर  जनम में बनके तुम आना मेरे शिव 
और में हर बार होती अग्नि अग्नि कुंडो में स्वाहा
मांगूंगी होने का वरदान तुम्हारी सती 
तुम्हारे संग में भी ये विष प्याला पियूंगी 
बनी हूँ रुदय संगिनी तो ये भी सब सहूंगी 
सब कुछ आधा -आधा हैं 
जीवन का मधु हो या विष प्याला हो !
हे शिव !
देख तुम्हरा जीवन 
सोगंध  में उठाती हूँ जो दीखते हैं स्वपन तुम्हारी आँखों में 
मै पूरा करती जाउंगी !
लेकिन  तुम्हरे संगबिन न पूरा हो कुछ 
इसीलिए कहती हूँ 
हे योगीश्वर !
मुझे असिशो ,जीवन का मार्ग दिखाओ 
कठिन हैं ये घड़ी जीवन की अब 
अपनी सती का इस जनम भी साथ निभाओ ................
श्री चरणों में स्वीकारो 
अपनी सती का मुस्काता चरण वंदन ।
अनुभूति

 मेरी कविताये मेरी आत्मा से अपने ईश्वर की स्तुति हैं  ,वो दिव्य रूप है जिसका आत्मा नित्य प्रतिक्षण दर्शन करती रहती हैं ।इन सबका जीवन के भोतिक स्वरुप से कोई ताल नहीं हैं ,ये मेरी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हैं जो साधरण मानव के जीवन की भोतिक सोच से परे हैं ।
अनुभूति








1 टिप्पणी:

शिवनाथ कुमार ने कहा…

भक्ति भाव से सराबोर सुंदर स्तुति !
सादर !