रविवार, 22 जुलाई 2012

मेरे पीताम्बर धारी !में पल -पल तरसूं हूँ पाने को तेरा वही स्नेह अपार











 ओ मेरे माधव !
पीताम्बर धारी !
मेरे पिया ,
लिखूं हूँ !
आज तव चरणन में स्नेह पांति ...............
जो देखूं में ये बरसते बदरा ,
अपनी वसुंधरा का करते सिंगार
में पल -पल तरसूं हूँ
पाने को तेरा वही स्नेह अपार 
देखूं धरती की हरियाली ,खिलते बसंती फुल
तो  मन ही मन जल जाऊं
किसे कहूँ मन की पीड़ा !
किसके सामने खड़ी हो
अपनी बासंती चूडियों की खनक सुनाऊ
एक पल में सजाये तुमने मेरे सारे स्वप्न छीन लिए
मेने जिसके स्नेह के लिए बदले अपने जीवन के स्वरुप
उसी ने दे पीड अपनी आत्मा के लिबास बदल लिए
इसीलिए तो कहती हूँ !
माधव !
तुम्हे संसार का सबसे बड़ा छलिया
फिर भी तेरेछले जाने को मन नहीं माने
क्योकि वो करता हैं तुझसे निस्वार्थ ,निश्चल प्रीत ........
सिखा हैं मेने तुझसे ही ये प्रीत का स्वरुप ,माधव
पाए बिना ही दिया हैं स्नेह तो फिर स्नेह ही स्नेह किया हैं ................

मीरा भी अपने मोहन की दीवानी थी,
मान अपने कृष्णा को सब कुछ
इस जग से बोराई थी ।
तब भी तुमने उसे संसार में तन्हा छोड़ा था ,
फिर भी उस पगली ने मेरी ही तरह तुम्हे हर श्वास
स्मरण किया था ,
हां तुम ही थे न माधव !
जिसने उस मासूम को विष प्याला दिया था ।
देखती हूँ तुम्हारे विराट रूपों को
युद्ध में खड़े होके बनते हो सारथि
बिन शस्त्र उठाये भी तुमने मार दिए थे कितने महारथी .........
इतना तुम याद रखना
 मैं  अब सहूंगी !
इस दुनिया की ,इस स्नेह की हर पीड़ा अपनी आत्मा पे झेलूंगी
लेकिन मे वो भीष्म हूँ ! जिसने सिर्फ सहना सिखा हैं,
तुम्हरे शस्त्र ना मुझपे उठाने की प्रतिज्ञा में ही तोडूंगी
और अंतिम घाव अपने इस आत्मा और कोमल तन पे झेल
प्राण तुम्हारे सामने तुम्हरे ही हाथो से त्यागुंगी .
मैं  वो सत्य हूँ !
जो विचलित होता हैं कभी पराजीत नहीं .......
पर मेरे माधव !
इस आत्मा में   तुम्हे पराजीत देखने की भावना भी नहीं
तुम क्या जानो !
तुमसे जितने में नहीं ,पराजय में कितना सुख
मुझसी प्रीत जो तुम कर जाते
मधुसूदन !
एक नया महारास तुम अपनी  राधा संग एक बार फिर रचाते
लेकिन ये कलयुग हैं कृष्णा !
मैं जानती हूँ !
तुम भी यंहा के इंसानों से  डरे हो ,,,,
इसीलिए तो अपनी आत्मा के इतने लिबास बदले हो ........
हां कृष्णा !
तुम इस कलयुग में अपना ही एक नया रूप धरे हो ,
अद्भुत हो !
अनुपम हो ,अखंड हो ! साकार होके भी निराकार हो !
जाने हो इसिलए तुम इस पगली
का चमकती बिंदिया का कुमकुम और
मेरी मांग की अद्भुत रेखा हो !
तुम तो सदा से कहा एक रूप धरे हो ,
सोचती हूँ तो अपनी इस मासूमियत पे खुद ही आंसू बहाती हूँ 
कोई नहीं समझाने वाला ,कोई नहीं मार्ग दिखाने वाले 
फिर  दिल को लगताहैं 
माधव !
तुम तो अन्तर्यामी जान  लेते हो
 किसी के मन की दुष्टता और सरलता की वाणी 
तो क्या मेरी आत्मा नहीं समझ पाए होगे 
जानते हो कोई नहीं इसके मेरे सिवा दूजा कोई 
ये पगली कैसी हैं जो जान के भी समझे ना 
दुनिया की रीत 
इसीलिए मुझे सम्हाले बैठे हो 
कहो ना पर अपना जाने बैठे हो ,जाने हो निस्वार्थ प्रीत 
समर्पण मेरे स्नेह की रीत 
हां इसीलिए बूंद -बूंद ये विष प्याला जीवन को दिया हैं |
विदिरण हैं आत्मा आज ,फट रही हैं बेबस रूह की शिराये 
किसी और से लड़ना होता तो में लड़ भी लेती 
अपनी ही आत्मा से कैसे मे लडूं !
थाम लो आज फिर मुझे अपनी बंसी की धुन से 
मेरे  इस जीवन को आज फिर वही 
अपने पीया का सिंगार दो 
इस पगली को फिर वही  स्नेह  दो
हां सूना हैं जीवन ,शून्य हैं सब कुछ तुम बिन माधव 
कभी तो आत्मा की इस पीड़ा को पहचान लो 
हां आज अपनी अनु 
को अपने कदमो में बैठ जीवन का नया ज्ञान दो .
तुम बिन में ,पल -पल ज़िंदा हूँ 
लेकिन ख़ाक हुए जा रही हूँ 
मुस्काती  हूँ बस तुम्हे मुस्काते  देखने को बस 
नहीं तो तुम्हारी सोगंध अभी में ये प्राण त्यज जाती .............
स्वीकार करो ,
टूटती बिखरती अनु का अश्रु पूरित ये चरण प्रक्षालन .....................
अनुभूति