शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

हर पल अनुभूति हैं आत्मा को






 हे मधुसदन !
आत्मा से तेरा असीम स्नेह अश्रु बन फुट पड़ता हैं 
और में नहा उठती हूँ तेरे स्नेह समंदर  में ..........
सब कुछ तो सत्य हैं यथार्थ हैं 
जिसकी हर पल अनुभूति हैं आत्मा को 
फिर को माधव तुम मुझसे इतने ही रूठे बैठे हो .............
कैसी हैं तेरी ये पत्थर की मूरत से मेरी प्रीत 
में मिटटी होती रहूँ और तू मुस्काता देखता रहे 
ये भी तेरे असीम स्नेह की रीत अनोखी 
मीरा भी पी गई थी विष प्याला 
अब जाने हूँ क्यों ?
माधव उसमे भी होगी तेरे स्नेह की मधु 
हां ,वो मधु ओ जो हर पल में पी मुस्काती हूँ 
और रोज अपने को और खुबसूरत 
तेरी उस मूरत की आँखों में पाती हूँ 
जानते हो माधव !
रोज जब में कुमकुम लागती हूँ 
तुम्हे किसी कोने से आप  को देख मुस्काता पाती हूँ 
यूँ  ही बरसाते रहो मुझपे 
अपने स्नेह की बारिश 
जीवन देखो एक -एक लम्हा बन गुजर जाएगा 
और एक दिन वो होगा 
जब मुझे मेरा मोक्ष मेरा बैकुंठ 
किसी चिता की अग्नि में प्रभु आप के हाथो मिल पायेगा ........................
श्री चरणों में अनुभूति का स्नेह अश्रुओं से नमन ,,,,,,,,

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