गुरुवार, 19 जुलाई 2012

ओ रूहों के अंधेरो को हरने वाले , दिव्य, सिंदूरी सूरज !


"श्री राम "
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकर सुधारी ।बरनऊरघुवर विमल जसु जो दायक फलचारी 
बुद्धि हीन तनु जानिके ,सुमिरौ पवन कुमार ।बल ,बुद्धि ,बिद्या देहूँ मोहि ,हरहु कलेश विकार ।
   

ओ रूहों के अंधेरो को हरने वाले 
 दिव्य ,
सिंदूरी सूरज !
मेरी आत्मा, की सत्य निष्ठा 
मेरे राम !
जानती हूँ मैँ ,
सदा तुमने विकट  परिस्थितियों में  
 सम रहकर ,शांत रहकर 
अपनी आत्मा की पुकार को सुनना
 ही संसार को सिखाया हैं ।
ये कैसे भ्रम ! 
मेरी आत्मा के समक्ष उपस्थित होने लगे हैं 
हे आदित्य !
मेरे राम के भी आराध्य 
मेरी इस आत्मा को इन भ्रमो से दूर कर 
मुझे मार्ग दो प्रभु !
सब तरफ घनघोर अँधेरा  हैं 
हैं सब कुछ साकार ,
लेकिन सब धुँधले  बादलों के पीछे छिपा हैं 
दूर कर इन अंधेरो को 
यथार्थ मेरे समक्ष उपस्थित करो .
जब तक तुम नहीं सुनते 
मेरी आत्मा से झरते ये अश्रु यूँ ही पखारते रहंगे 
तुम्हारे चरण ,
मेरा कोई नहीं था गुरु ,
तुम तो देने वाले संसार को उजाला 
इसीलिए मेने तुम्ही से सिखा था जीवन को नियमित करना 
अपना काम करना और भूल जाना 
मेरी तपस्या फिर कही टूटी है 
हे प्रभु!
फिर दो मुझे कठोर तपस्या का 
 आशीष ,ताकि में भी अपने आराध्य   की तरह 
पा  जाऊं जीवन की इस लंका का पार 
मेरे राम !
 तो मिले थे अपनी विरहणी  सीता से 
लेकिन में इस भव साग़र  को पार कर पाऊ  मोक्ष ......
और तुम्हरा ही अंश मिल जाए तुममे ,,,,,,,,,,,,,,,,
अनुभूति