शनिवार, 30 जून 2012

तेरी इबादत हो कैसी ?

मेरे खुदा !
तेरी  साँसों की खुशबुओं से ही,
 मैं अब तक ज़िंदा हूँ 
तुझे क्या  पता!
तेरे बिन जिंदगी का तनहा गुजरता लम्हा हूँ  ,मैं

फ़रिश्ते  ही मिला करते हैं क्यों मुझे !
इस खुशी में ही  ,
 दीवाना, एक खुदा का बंदा हूँ मैं

जो ये दर्द न हो दिल में तो .
तेरी इबादत हो कैसी ?
अश्को से तेरी इबादत करने
 का अपना ही मजा हैं 
में लुटा दूँ ,ये जिंदगी तो कम है ,मेरे खुदा !
 बस दुआ करता हूँ में 
तुझे  में हँसता देख 
तेरी मुस्कुराहटों से में भी जीता रहूँ और ता उम्र करता रहूँ मैं तेरी इबादत


1 टिप्पणी:

वन्दना ने कहा…

सुन्दर भाव