शनिवार, 9 जून 2012

तेरी माटी की मूरत से मेने प्रीत काहे जोड़ी

मेरे मुरली मनोहर !
हे पीताम्बर धारी !
हे मधुसुदन !
हे घनश्याम !
तेरी माटी  की मूरत से मेने प्रीत काहे जोड़ी
सारी  दुनिया कहे मोहे तोरी
पर तू दूर खडा सुनता रहे निर्मोही
और में भी दीवानी
इस संसार अपने मातृत्व की  ,कृष्णा
एक तुझसे ही आस लगाये
चरणों में बैठी रोती  रहूँ
सब कहे पुकार तेरे ठाकुर को
में पुकारूं
पर ये जानू ,इस दुनिया में न जाने मुझसे कई दुखी होंगे
पर वो उनकी चिंता कर ले
फिर एक नजर बस स्नेह से मेरी और भी देख ले
कोई आस नहीं और मोरी
एक वचन तेरे कदमो में दिया निभाने को
ही में जी रही ,ओ निर्मोही
वरना आस नहीं और बची
मेरी जीवन से कुछ पाने की भी अब थोड़ी
अविरल बहती हैं इन आखो से ये अश्रु धारा
पग तेरे पखारने को तरसा करती हैं
रोज गुलाबी चरण चूमने को तेरे
अपनी ही सासों से लड़ा किया करती हैं
लड़ते -लड़ते भी हारी हूँ
जो तुम न हो ,तो ये जीवन का हर क्षण मुझपे भारी हैं
हे कृष्णा !
मेरी भक्ति की लाज रखना
मेरे इस बाँझ होने के कलंक को तुम हरना
हरना प्रभु !
इतनी ही विनती हैं ,इतना ही विशवास
कान्हा तुझपे मोहे
कभी तो बाल रूप धर
अपनी एक छबी मोहे आंचल भी दीजो
हां दीजो न करुना सागर
तुम्हारी अनुभूति ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!