गुरुवार, 31 मई 2012

मोहे मोक्ष दीजो दीनानाथ !








हे कोस्तुभधारी !
मेरे गोविन्द !
तेरी कोस्तुभ सी चमकती छबी  मे देखू 
जबभी 
तेरा अनंत तेज अपनी आत्मा में रोशन पाऊं 
मेने सब कुछ सौप दिया तेरे चरणों में 
क्या जीवन ? क्या मृत्यु ?
मेरी हंसी में अब तेरे साथ दोनों खेले 
सोचू में माधव !
तुम तो संसार को रचने वाले 
और में तुम्हारी चरण धूलि भी नहीं 
सोचती हूँ किसी दिन जब तुम 
साकार दर्शन मुझे दोगे 
मेरे पास कुछ भी नहीं जो में जो 
तुझे दे पाऊं ,
सोचती हूँ!
राधा तरसती होगी तेरे अधरों को 
पर ,मैं  तेरे गुलाबी  कदमो को अपने अधरों से चूम लुंगी 
बस ये ही मेरी जिंदगी का मोक्ष होगा|
और जीवन को अंतिम तेरी ही शरणागति होगी ........................
मेरे माधव !
कुछ नहीं हैं अन्तर्यामी जो संसार में कोई तुझसे छिपा हो
हां इतना जानू, में
इस जीवन का ये कष्ट ही मेरे मोक्ष का मार्ग बना हो
मोहे मोक्ष दीजो
दीनानाथ !
श्री चरणों में एक करूँ पुकार अनुभूति कि भी स्वीकार कीजो ...


1 टिप्पणी:

वन्दना ने कहा…

सुन्दर प्रार्थना जरूर सुनेंगे