बुधवार, 30 मई 2012

मेरी साँसों की ये डोर टूट न जाए

मेरे माधव !
केसे छिपाऊं ?
में तुझसे मन कीबतियाँ
तेरा हँसता मुख देख में जहर भी पी जाऊं 
इस संसार में गलती  मोसे एक हो गयी 
सारी दुनिया छोड में काहे तेरे कदमो में खो गयी 
मेरी साँसे ,मेरे आंसू तुझे ही पुकारे 
और तू सब सुन के भी दूर खड़ा मुस्काए 
जानती हूँ विष प्याला मुझे पीना हैं 
कैसा हैं तेरा ये संसार ?
सीधा इंसान ,जो सहे अपना धरम निभाए 
वो सदा विष प्याला ही पीता जाए 
ये कैसी रीत रची हैं श्याम तुने 
डरती हूँ बस तेरे कदमो में आने से पहले 
तेरे दर्शन से पहले ,
मेरी साँसों की ये डोर टूट न जाए 
जाने हैं माधव तू ही मेरी पीड 
हर तरफ तू ही हैं मेरा
चाहे में तुझे पुकारूं बुलाके राम
चाहे रहीम
मेरी विपदा हरो
ओ बैकुंठ के वासी
मेरे  जगदीश !
ये कैसा न्याय प्रभु जी !
एक तरफ चमके माग में सिंदूर की रेख
और कुमकुम के सूरज की चमक तेरी
दूजे पल तू दे जाए ,
ये  विष प्याले की सीख
कोई नहीं मेरा ऐसा जिसके काँधे पे सर रख के रोलूं
मेरी  कल्पना का स्नेह भी तुम 
और तुझे ही मान बेठी में अपनी प्रीत
अब बता किसे पुकारूं में बुलाके अपना इस संसार
एक  नया कलंक क्यों तुने मेरी आत्मा को दे डाला
में इस संसार के कलंक नहीं सह पाउंगी
मेरे माधव !
डर हैं मुझे तेरे बैकुंठ से
पहले में अपने प्राण  त्यज जाउंगी .....................
ऐसा न होने देना माधव
नहीं तो में अपने सत्य वचन की लाज नहीं रख पाउंगी ..............
श्री चरणों में अनुभूति .........................


6 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर भक्तिमय प्रस्तुति....

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....

kunwarji's ने कहा…

निःशब्द करती मार्मिक पुकार,
बस एक प्रार्थना उस केशव से कि आपकी पुकार जल्दी सुने...
कुँवर ji,

kunwarji's ने कहा…

निःशब्द करती मार्मिक पुकार,
बस एक प्रार्थना उस केशव से कि आपकी पुकार जल्दी सुने...
कुँवर ji,

वन्दना ने कहा…

अब तो उसे ये पुकार सुननी ही पडेगी

रामेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

जय हो सीता मैया की,जय हो माता जानकी की,जहाँ गयीं जानकी वहाँ पडी जानकी,माते सुनले अर्ज हमारी,न दिखे डगर अन्धियारी.