शनिवार, 7 अप्रैल 2012

ओ मृगनयनी !

ओ मृगनयनी !
प्रिय ,
तुम कोन हो !
जो रोज चली आती हो मेरे स्वप्नों के द्वार
धीमी -धीमी पायलों की मधुर पदचाप के साथ
क्यों तुम रोज मेरे नैनों में समाती हो .
तुम जो भी हो
अप्सरा हो या परी हो
अब न इस चातक को यूँ तरसाओ
यूँ रोज न मेरे नींदों को चुराओं
हां अब चली आओ .चली आओ ............
दुल्हन बन मेरे घर आँगन के द्द्वार
अब नहीं होता मुझे
स्वप्न प्रणय
और तुम्हरा ये इन्तजार
हां चली आओ अब
मेरे घर आँगन के द्वार ,,,,,,,,,,,,,
तुम्हारी हर घड़ी ,
हर पल प्रतीक्षा हैं
मुझे ओ मृगनयनी
अनुभूति

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