मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

खाहिश हैं !

ऐ खुदा !
 ये जिन्दगी की कैसी जिद हैं !
.कैसी फरमाइश हैं !
जिसकी मोहब्बत में मरने की आदत हैं 
उसी के शाने पे सर रख के रोने की खाहिश हैं ।
वो बंधा हैं उसूलो से ,करता हैं मोहब्बत अपने ही रूह  से 
या खुदा ,ये कैसी तेरी  इबादत की खाहिश हैं ।
जलना ,मिटना ,मरना भी मंजूर हैं 
जिन्दगी तेरे  नाम पे लिख के गवा देना भी मंजूर हैं 
हां पर तुझे से तेरी ही मोहब्बत के इकरार की खाहिश हैं ।  
मेरे अल्लाह !
ये कैसी मोहब्बत हैं मेरी. जिसमे जिंदगी फना करने की खाहिश हैं 
जिसका वजूद भी नहीं मोजूद उसी {खुदा }की चाहत में मर जाने की खाहिश हैं ।
मेरे मालिक !
 मुझे अता कर रूहे ऐ सुकून 
इस जिंदगी मेंतेरी ही मोहब्बत में जीने की ,मरने की ,जलते रहने की 
और  बस तेरे ही कदमो की इबादत की खाहिश हैं ...................

   

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