मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

यथार्थ सत्य

    मेरे माधव !
कैसे हैं जटिल प्रणय पाश तुम्हारे 
आलिंगन हैं फिर भी क्यों प्यासे हैं
हम इस तृष्णा के मारे 
तुम चन्दन में तो धुल भी नहीं 
तुम सागर में तो नीरभी नहीं 
मिलन तो हैंये सिर्फ आत्मा का 
यथार्थ के धरातल पे कही कुछ नहीं 
सब कुछ तो बिखरा पड़ा हैं 
मेरा ही अंतस मुझसे लुटा पड़ा हैं 
मेरे माधव !
कैसी हैं ये तेरी प्रीत !
न मुझसे तेरी ये पीड सही जाए 
न अपने मन की बतिया कहे बिना रहा जाए 
काश ख्यालो के बहार भी कोई सच मेरे लिए रहा होता 
कृष्णा ,कभी तो कोई रूप धार के मेरे लिए भी खड़ा होता 
कुछ नहीं हैं ,कोई नहीं हैं मेरे लिए 
ये सब बहुत कड़वा हैं 
लेकिन अब विषादो से डर नहीं 
कोनसा मन का कोना इनसे खाली पड़ा हैं 
तुम बस अपने ही मथुरा में हँसते रहो 
और में तुम्हे मुस्काते देख यूँ ही दम तोड़ दूँ 
बस ये ही जिंदगी का यथार्थ सत्य हैं 
मेरे माधव !

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