रविवार, 22 अप्रैल 2012

हे माधव !मेने पकड़ रखे हैं तुम्हारे ये चरण

  मेरे माधव !
मेने पकड रखे हैं
 अपने दोनों हाथो से तुम्हारे ये चरण 
कोई विषाद नहीं घेरता मुझे जब तुम होते हो साथ 
में धन्य हूँ !
पाकर तुम्हारे असीम ,अनंत ,निराकार स्नेह को 
तुम्हारी ही तरह असीम और धवल हैं 
तुम्हारी होठो की मुरली की मधुर धुन 
में जानती हूँ !
माधव !
तुम मुझे नहीं बुलाओगे 
मुझे ही ये संसार की माया छोड आना होगा 
बस कुछ एक दायित्वों को पूर्ण कर लू 
जो जिसका हैं .
उसे सौप दूँ 
फिर में चली आउंगी तुम्हारे चरणों के धाम 
मै जानती हूँ !
तुम बांसुरी बजाते रहोगे 
और मेरे जख्मो पे अपने असीम स्नेह का 
मल्हम लगाते रहोगे |
हां ,तुम्हारे इस मल्हम ने ,
असीम स्नेह ने ही तो मुझे जिन्दा रखा हैं आज तक
 इसीलिए तो माधव मेरी प्रत्येक श्वास पे तुम्हरा नाम हैं 
    हां तुम ही तो हो मेरे अखंडसोभाग्य
 हां तुम्हारे नाम का कुमकुम ही
  मेरे मस्तक पे , श्याम !
 संसार के मानव तो जन्म लेते हैं और अपनी गति को प्राप्त होते हैं 
  लेकिन तुम तो अखंड हो ,साकार होके भी निराकार हो
   इसीलिए तो में सदा सौभाग्यवती हूँ !
  और सदा खनकती हूँ !
बासंती चूडियों से 
      बजती  पायलों से और खनकता हैं मेरा रोम -रोम 
          तुम्हारी बंसी की धुन से
        हां माधव इसीलिए मेने पकड रखे हैं 
          तुम्हरे चरण कमल अपने दोनों हाथो से |
   में इस संसार में जब तक जीवित हूँ ,
      और उसके बाद तुम्हारे 
     बैकुंठ  में मुझे ,कुछ और दो न दो .
      मुझे सिर्फ दे देना 
      इन चरणों को अपने अश्रुओं से पूजने की सेवा  
 बस मेरे माधव इतनी ही अर्ज हैं तुम्हारे 
  श्री चरणों में



1 टिप्पणी:

ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने कहा…

बहुत सुन्दर..रचना.....जबर्दस्त भाव भंगिमा से सराबोर..कवित्त है...जय श्रीगोपाल