गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

ये तेरी केसी माया हैं ,मेरे गिरिधर !



 मेरे  ठाकुर !
रोज रात आती हैं और
तुमसे मिलने की ,
तुम्हरा ही, अनुराग पाने की 
एक नयी खाहिश जगा जाती हैं ........
मेरे माधव ! 
कैसी तृष्णा हैं ये जीवन की !
जिसका अस्तित्व भी कही नहीं 'युग पृष्ठ पर "
उसकी के होने का पूर्व आभास करा जाती हैं ,,,,,,,,,,,,
ये तेरी केसी माया हैं
मै सोच सकती तो, कब का पा भी लेती 
लेकिन तुम तो कबसे सब कुछ सोचे बैठे हो !
ये आभास कराने में जिंदगी कितना वक्त लगा जाती हैं ..................
मेरे  गोविन्द !
इतना जान लिया मेने आज
तुम कहा से कब .क्या कर दो तुम ही जानो 
हम दुनिया वाले तो बस तुम्हारी लीला देखते ही रह जाए 
और जिसपे बीते वो आश्चर्य से 
तेरी भक्ति के सागर में डूब जाए 
ये तेरी केसी माया हैं ......................
श्री चरणों में अनुभूति


6 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

प्यारा भजन नुमा कविता....
.....एक शानदार कृति
आपकी ये रचना नईपुरानी हलचल में लिंक की जा रही है
सादर
यशोदा

यशवन्त माथुर ने कहा…

कल 21/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (यशोदा अग्रवाल जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

कविता रावत ने कहा…

गिरधर की माया तो अपरम्पार होती है .. ..
बहुत सुन्दर रचना

वन्दना ने कहा…

और जिसपे बीते वो आश्चर्य से
तेरी भक्ति के सागर में डूब जाए
ये तेरी केसी माया हैं ......................बस यही उसकी माया है जिसे कोई समझ ना पाया है।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

bhakti aaur ishwar prem ke rash me duboi shandaar rachna

Mamta Bajpai ने कहा…

भक्ति रस से सराबोर कर दिया
बधाई