शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

मेरे अनोखे प्रियतम ,ओ मेरे गिरिधर !





 ओ मेरे गिरिधर !
ये पूनम का चाँद सोने नहीं देता मुझे ,
तुम्हारी ही तरह ताका करता हैं एक टक मुझे 
और तुम ,तुम बस खामोश से देखते ही रहते हो 
काहे नहीं छेड़ते कोई धुन 
हां कोई धुन अपने होठो की मुरलिया की 

जानते हो ,माधव 
बड़े निष्ठुर हो तुम 
संसार  के जगदीश्वर और मेरे प्रियतम !
इस सुहानी रात भी बस पत्थर बन ताका ही करते हो 
कहते नहीं ,कभी कुछ 
मेरी रूह ,मेरी ये मादकता तरसती हैं 
प्रिय तुम्हारे आलिंगन को 
और तुम सदा ही कहा करते हो 
ठहरो सखी ,इन्तजार 
तुम्हे ये धरती छोड ,
मेरे साथ इस आकाश पे ही आना हैं .............


माधव !
तुम और तुम्हारी खामोश बाते 
और मेरे स्वपन 
कही अधूरे ही न रह जाए 
अधूरा ही न रह जाएँ ,
प्रियतम!
 हमारा मिलन ,बस ये सोच के रोज घबराती हूँ
सोचती हूँ संसार मुझे बावरी कहता हैं 
जो में तेरी खामोश पत्थर की मूरत से बतियाती हूँ 
तेरे कदमो मै बैठ के सब कुछ कह जाती हूँ 
जिस  रास्ते पे मै बड़ी जा रही हूँ 
बस सोचती हूँ 
तुम कही अब मेरा साथ देते -देते रूठ ना जाना 
में  तन्हा रह जाउंगी 
मेरे अनोखे प्रियतम तुम बिन 
तुम्हारी अनुभूति तुम्हारे श्री चरणों में ,,,,,,,,,,,,,
इस पूनम की चांदनी में मुस्कुराते हुए तुम्हारे ख्यालों में





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