मंगलवार, 6 मार्च 2012

इस जिन्दगी के दर्द के खिलाफ

तुम मुझे सदा अपनी ही तरह लगते हो ,
खामोशी से सब कुछ सहते -सहते
फर्क इतना हैं मेरा अंतस
जब फट पड़ता हैं असीम वेदना से
मेरे अश्क गिरते हैं ,
और तुम जब दर्द से लड़ते हो
तुम्हारे हाथो में धसे किलों से रक्त बहता हैं
तुम्हारे इस असीम दर्द को सहने की क्षमता ने ही
तुम्हे खुदा बना दिया
और में सह सका तुम्हारी तरह ,
तो कभी कृष्ण ,कभी राम और कभी इशु के रूप में
तुम्हारी बंदगी करने लगा
और मांगने लगा इस दर्द को सहने की असीम शक्ति
और जब -जब भी मे निराश था ,
मरने की कगार पे खड़ी थी
तुमने आके बड़े प्यार से अपना हाथ बड़ा के मुझे थाम लिया ,
सिखलाया अभी तुम्हे हारना नहीं लड़ना हैं
इस जिन्दगी के दर्द के खिलाफ
डरो नहीं सामना करो
में तुम्हारे साथ ,तुम्हरा हाथ थामे ,सदा ही खड़ा हूँ !
तुम तन्हा नहीं ,
मै
संग हूँ तुम्हारे ,
इस
दर्द के खिलाफ
मेरे मसीहा !
तुम्हारे
कदमो में तुम्हारी अनुभूति

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