गुरुवार, 1 मार्च 2012

क्यों नहीं आते, माधव !




तुम्हारी  आहटें सुनने को तरते कान 
और पलकों के किनारे से गिरते ये मोती 
रूह की तड़प को बया  नहीं कर पाते 
सोचते हैं तुम कँहा होगे ?
केसे होगे ?
क्यों माधव क्यों ?
तुम्हारी इतनी प्रतीक्षा हैं इन श्वासों को 
तुम्हे देखे बिना ,
मिले बिना ,
जाने बिना ,
कैसा दिव्य रूप इस आत्मा में बस गया हैं 
जो पल -पल तुम्हारी आत्मा की
 विशालता का पता देता हैं 
सब कुछ जानकार भी व्याकुल हैं नयन
 तुम्हारी एक छबी देखने को 
एक बार तुम्हारे चरणों में करने को प्रणाम 
केसी दिव्य अनुभूतियाँ हैं ?
तुम्हारे इस असीम स्नेह सागर की 
तुम्हारा दिया स्नेह सागर तुम्हारी ही बाट जोहता हैं मधुसुदन !
क्यों नहीं आते माधव ! 
कोनसा अपराध मुझसे हुआ हैं जगदीश्वर !
जिसकी ये विरह सजा बना हैं 
प्रियतम !
तुम बिन क्यों मुझे यूँ  जीना पद रहा हैं 
सारे मन के बैर भुला हंस दो न कान्हा जी !
पलकों से डगर बुहारते हैं थकते नहीं नयन 
तुम्हारी पर्तीक्षा में बस पलकों के कोने भीगा करते हैं 
तुम बिन कोई नहीं हैं दूजा 
जो समझ सके आत्मा का  ये स्नेह अपार 
स्पन्दन हीन रिश्तों में तुम निराकार 
होकर भी साकार रूप धरे खड़े हो .
अपने एक हाथ से मेरा हाथ थामे खड़े कहते हो
" अनु , देख तेरे साथ तुझे थामे खड़ा हूँ ,
फिर मौन क्यूँ खड़े हो ,सुन रहे हो देख रहे 
और सदा की तरह बस परीक्षा ही लिए जा रहे हो 
आखिर कब तक नहीं आओगे माधव 
मेरे ये नयन तुम्हारी प्रतीक्षा में जड़ बन गए हैं 
चले आओ माधव !
अब चले भी आओ  ।
श्री चरणों में तुम्हारी अनुभूति 



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