सोमवार, 22 अगस्त 2011

काजल

मेरे श्याम !
में लगाऊं इन अखियन में काजल तो भी
आत्मा में बसी छबी,
मन की गागर से
झलक जाए इस दर्पण में
और तुम्झे देख अपने से ही लजाऊ

तुम मुझे रूठे भी हो तो कँहा
में तुमसे रूठना सोच भी पाऊं
पैर पकडू तोरे ,
इन काजल भरी अखियन से
नीर बहाती ,तुझे मनाऊ

सब कुछ हैं यंहा तुम बिन भी मेरे कृष्णा ! ,
फिर भी जीवन की एक आहट सुनी पड़ी हैं
तुझसे क्या छिपा हैं
मेरे अंतस के स्वामी
मेरा तो सब कुछ तेरे स्नेह के नाम गिरवी पडा हैं
ये साँसे चलती तो हैं कृष्णा !
पर पायलो की झंकार सुनी पड़ी हैं


अनुभूति