बुधवार, 10 अगस्त 2011

या वफ़ा हो तुम


मेरी हर सुबह इन आँखों सेटपकती नूर की बूंद ,
से रिमझिम गिरती बरखा हो तुम '
तुम्हे खुद नहीं पता मेरे लिये
एक सजा हो
या
वफ़ा हो तुम
जिस मोड़ पे लायी हैं जिन्दगी
अपने आप से ही भागा फिरता हूँ में
अपने ही अंतस से अपने ही सत्य के लिए लड़ा किया करता हूँ में
इस झूठी दुनिया में फरेबी पत्थरों केसाथ ,
रहते -रहते तुम भी दो रंगी रंगों में ढल ही गए ,
में लड़ता ही रहा अपने सत्य के लिए और तुम
इस दुनिया के रंगों में ढल गए ।
काश में tumजेसा ही
अपने लिए ये दुआ करता रहूंगा
मरता हूँ में पल -पल फिर भी तेरे नाम से
फिर भी कही तो जिया करूंगा |
हैं तुमने इन आँखों को ,
इस रूह को कुछ सोगाते
इसीलिए तेरे ही गुरुर के लिये जीता रहूंगा मै
अनुभूति