शनिवार, 25 जून 2011

अंतस हर एक नारी का

तुम्ही हो जो सह सकती हो
तन की हर पीड़ा ,
मन की हर आह
हर ताना ,हर उपहास
तुम्हे ही बनाया गया हैं
असीम वेदनाओं कोसहने के लिए ,
इसीलिए तो संसार करता हैं
कभी माँ , कभी पत्नी ,,
कभी प्रेमिका के रूप में तुम्हारी पुकार
हां क्योकि तुम सहती ही रहोगी ,
कभी नहीं करोगी कोई प्रतिकार ,
में जानती हूँ इशु की तरह कोई तुम्हे सलीब पे ,
भी झुला दे तो तुम निभाती रहोगी धर्म
पुरुष को दे पौरुश्तव तुमने दे सम्मान किया हैं ,
चरणों में
अपने स्थान को स्वीकार
लेकिन उसी ने तुम्हारे अंतस को मारी हैं ठोकर
हर बार |
चरणों का स्थान तो तुम्हारी आत्मा के ,
अनन्य स्नेह का समर्पण का रूप हैं |
कँहा समझ सके प्रिये तुम कभी
इस स्नेह और समर्पण को |
अनुभूति

मेरे राम ,

मेरे राम ,
जब देखू में तुहारी ये अखियाँ 
खो जाऊं में संसार की भूल बतियाँ ,
मुझे प्यारा सबसे तेरा सच ,
तेरे वचन , तेरे शब्द , तेरी मुस्कान
आपसे ही जुडी हैं मेरी हर सास 
आप ही मेरे ठाकुर !
आप ही मेरे जागीरदार 
मेअधीन आप के ,
बिन दिए भी मानु 
आप का आदेश हर सांस 
बसे हो मुझे में अपनी ,
आदेश की खुबसूरत हुकूमत के साथ
जिसके एक आदेश के साथ  मिट जाएँ मेरा जीवन 
अद्भुत होगा ऐसे मेरे राम का दर्शन 
संजोये रखे ही नहीं अपनाए हैं
मेने जिन्दगी की लड़ियों में आप के आदर्श
सिखा हैं ,निभाती चलूंगी
बस मुझे यूँ ही राह दिखाते चलना 
तेरे सिवा दूजा कोई नहीं 
जो कभी मेरी सुरक्षा के लिए हाथ बदाये 
बस मुझे यूँ ही अपने स्नेह आशीष 
से महफूज बनाएं चलना |
अनुभूति