शनिवार, 4 जून 2011

मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !

कोई कविता
या
गजल कहू केसे!
मेरे कोस्तुभ स्वामी!
मेरी आत्मा का हर छोर तो खुला पडा हैं आप के सामने ,
मेरे तो आंसुओं में भी आप हो और खिलती मुस्कराहट में भी आप हो 
मेरे तो मन का हर भाव भी आप और उससे बना शब्द भी आप .
मेरे कान्हा !
में तो कुछ लिख नहीं सकती
क्योकि मेरी याद भी आप ही हैं
कोस्तुभ धारी !
मेरी जिन्दगी भी आप ही हैं कन्हाई !
और कहू की आने वाला पल ,
और गुजरा हर लम्हा भी आप ही हैं
मुरलीधर !
मेरे तन मन , साँसों की खुशबु भी
आप ही के नाम से आती हैं
कान्हा !
दुनिया से कोई डर नहीं मुझे तेरी भक्ति में
मेने तो दुनिया ही त्याग दी हैं,
मेरे कृष्णा !
किसको कहू ,किसको बताऊ
की मेरे कोस्तुभ धारी!
में तुझे आपनी आत्मा से कितना चाहूँ .
आप मेरे स्वामी में
में आप की चरण दासी कान्हा जी !
फिर दूजा कोंन जो हमारे बीच सके |
मेरे कान्हा !
तेरे हाल पे में केसे हंसू !
आप भले ही मेरे हाल पे हँसते जाओं |
में तो हकीकत में हूँ
तेरी चरण दासी कान्हा !
तो काहे भुलाये बठे हो गिरिधर मुझे
में तो तुमसे कभी रूठू ,
तुम भी मुझे रूठे नहीं कभी
तो हम एक दुसरे को मनाये क्यों ?
हम तो हर पल -पल हर लम्हा साथ ही थे हैं और रहंगे
फिर मेरे कृष्ण,कन्हियाँ !
नहीं लिख सकती इसीलिए कोई गजल
या कविता जो दर्द से भरी हो
जिसके रोंम -रोंम  मेंआप बसे हो ,
मेरे गिरिधर गोपाल!
उसके पास क्या खोना ,क्या तो पाना
क्या याद जाना
क्या हकीकत, क्या खाब
सब कुछ तेरा हैं मेरे कोस्तुभ धारी !
मुझे कभी नहीं लगा मेरा कान्हा मुझसे रूठा हैं
में रूठी हूँ कई बार दे दे ताना
तुम तो सरलता का सागर !
स्नेहाधिपति !
करुनाधर !
श्री हरी !
हर रूप हर रंग , हर सांस ,
कितना नशे में हूँ तेरे
कोस्तुभ के स्वामी
इन शबदो से केसे समझाऊ
इसीलिए नहीं लिख सकती
में कोई गजल या कविता
तुम्हारे असीम स्नेह पे
कोस्तुभ स्वामी !
मेरा स्नेह देखना हैं तो उड़ कर चले आओ ,
मेरा तो सपना अधूरा पडा हैं,
मेरे श्याम सलोने तेरे दर्शन का
 तेरे मेरे अंतहीन मिलन का
में प्रतीक्षारत हूँ सदा से
सदा रहूंगी |
सिर्फ अपने कान्हा की
कोस्तुभ स्वामी की
दासी


अनुभूति

जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ओ मेरे कोस्तुभ धारी , कान्हा ,

ओ मेरे कोस्तुभ धारी ,
कान्हा ,
आज मोहित हूँ 
तेरा मासूम ह्रदय रूप देखकर ,
कितना सरल ,
निष्कपट तेरा रोम -रोम 
मेरे कान्हा!
मन हैं धवल आकाश ,
आत्मा हैं या,
स्वयं वासुदेव का गुण 
अनंत आकाश की उचाईयों के साथ ,
धरती का आलिंगन भी तुम्हारे ह्रदय में 
कान्हा जी |
मेरे रोम -रोम के स्वामी 
बलिहारी जाऊ इस मासूम रूप में तुहारे 
जी चाहे उतार लू आज बलाएँ सारी ,
बन जाऊ यशोदा 
लगा लू गले से अपने कान्हा को ,
मासुम सी बातोको  , 
सरलता को , 
आज बलि हारी हूँ 
कन्हियाँ  !
तेरी निष्कपट ,
सरल , स्नेह भरी 
वाणी पे , 
तेरी मुरली की तान पे |
नत मस्तक हूँ 
अपने राम के श्री चरणों में !
उन्होंने जो दिया हैं ,
मुझे कान्हा !
तेरा ये भक्ति संसार
ओ कान्हा , 
केसे कहू ?
केसे समझाऊ ?
तुझपे में बलिहारी जाऊ
मेरे कन्हाई !

अनुभूति