शुक्रवार, 27 मई 2011

ज्ञान का समन्दर

ओ कान्हा जी ,
आप तो चौसठ कलाओं के ज्ञाता ,
एक - एक भी सीखी प्रभु तो 
चौसठ जनम लेना होंगे ,
तेरी लीलाओं को समझने के लिए,
मुझे अभी कई जनम और लगेंगे प्रभु !
एक भागवत ही नहीं अभी समझ नहीं आई 
कोनसी कृष्ण लीला समझ आएँगी मुझे
प्रभु! 
आप  तो ज्ञान का समन्दर और
में नन्ही सी बूंद 
पता नहीं कँहा खो जाउंगी इस समन्दर में
थोड़ा -थोड़ा ही सही,
सीखना चाहती हूँ सब कुछ
बस ये ही में जीवन में  कर सकती हूँ|
में अल्प बुद्दी ,अज्ञानी प्रभु !
तेरा नाम लेने के सिवा मुझे आयें न कोई और काम |




अनुभूति

माँ

वो शांत ,स्वच्छ गंगा की लहरें  ,
सदा से मुझे खिचती आई हैं ,
अपनी माँ ,की गोद की तरह  ,
जेसे शांत सो जाउंगी में, माँ  गोद में ,
बुला लो मुझे अपने घर उन्ही पहाडों की गोद में ,


सब से छुट के,
बंधी कँहा हूँ किसी से 
बस अपने ही स्वार्थ से 
स्वार्थी बन के बाँध रखा हैं 
कुछ पलों के बंधन को
सारे बंधन शून्य हैं नगण्य हैं |

बस अपने चारो तरफ 
तन्हाई और सफेद शांत नीर ही नजर आता हैं |
ओ माँ ,मुझे स्वीकार करो मुझे अपनी गोद में ,

 माँ , तेरे वात्सल्य को महसूस किया हैं मेने 
तेरे हर शब्द में , अपनी पुकार के जवाब में 
तुम  आनंदरुपा.ब्रहम  विद्या ,दुर्गा ही हो न ,


कितनी करुणामयी हो न माँ ,
जब कोई नहीं पास तुमने स्वीकार कर लिया मुझे 
इस तन्हाई में और ज्वर में ,
मेरे अपने होने का दावा  करके अधिकार जताने वालो ने 
भी मुझे स्वीकार नहीं किया .
और तुमने बड़ी सरलता से एक निवेदन , 
एक पुकार पे दे दी अपनी गोद
इसीलिए तो तुम माँ हो ,

चाहें वो मेरे लिए तेरी लहरों की गोद हो,
या तेरी आरधना की छाया ,
दोनों में ही अथाह शांति और अथाह स्नेह भरा पड़ा हैं |
मुझे नहीं करनी पड़ेगी किसी से विनती .
न लगानी होगी स्नेह की गुहार 
जी भर के रो सकुंगी तेरे आँचल में 
और कह सकुंगी अपनी हर पीड़ा
जो किसी से नहीं कहा , कह सकुंगी तुमसे 
अपने अधूरे अस्त्तिव की पीड़ा,
समझा सकुंगी तुम्हे माँ ,
मेरा वात्सल्य तो सूखता ही जा रहा हैं,
मेरी आत्मा की तरह
पर माँ तेरी गोद देखकर दिनों से बैचेन
तन और मन की वेदना से लडती अब थक गयी हूँ
और फुट पड़ी हैं अतृप्त आत्मा ,
हां ,माँ मुझे कुछ घड़ी यूँ ही,
अपने आंचल की छावँ में सो जाने दो |
न जाने कब से प्यासी हूँ तुम्हारे वात्सल्य के लिए माँ

अनुभूति

ओ !मेरे सपनों के सोदागर !

 ओ !मेरे सपनों  के सोदागर !
मेने देखा नहीं कभी तुम्हे , 
बस अपनी सांसो में 
एक कल्पना बनाना कर छिपा रखा हैं ,
अपने अंतस में
जब भी सुनती हूँ कोई गीत मिलन का
तो तड़प उठती हूँ कोई होगा कही 
जो इन आँखों से ढलते अश्को को अपने अधरों से पी जाएगा ,
और कहेगा , अनु अब नहीं !
विशवास करो मेरा तुम्हारे साथ ही खड़ा हूँ ,
तुम्हारी आत्मा में ,अनु देखो तो सही ,
और सुनती हूँ कोई गीत विरह का तो लगता हैं 
कोई मेरे लियें भी बैचेन हो रहा होगा ,
फिर भी सही नहीं जानती अपने अंतस में छिपी 
उस चाहत की तड़प ,
लगता हैं कभी वो आये और 
मुझे कहे थोड़ा और इन्तजार करो में आ रहा हूँ
तुम्हे लेने इस संसार से ,
में खड़ा करूंगा तुम्हे इस दुनिया के सामने 
मेरे अन्दर की कमजोर नारी करती हैं बाते 
अपने अंतस में छिपे सपनो के सोदागर से
जो ,यंहा कही नहीं मेने देखा | 

बस महसूस ही करती रही हूँ अपनी आत्मा से 
तुम्हे ओ मेरे सपनी के सोदागर !
"अनुभूति "


तेरी विशालता , मेरे राम !

मेरे राम ,

जितना स्नेह दिया , जितना दिया स्वप्न संसार 
केसे चुका सकुंगी में ,कहो आप का ये आभार ?

गीत दिए जीवन को ,प्रीत दी मन के सुने आंगन को 
एक बार नहीं कहता क्यों मन इन चरणों से उठाकर गले लगाने को ?


जितना सरल ह्रदय आप का ,
उतनी ही तन  कठोर हैं आप का
सारा स्नेह भी मेरे नाम 
सारा त्याग भी मेरे नाम 

एक तरफ स्नेह का सागर
और दूजी तरफ विष का प्याला ,
भी इस अहिल्या के नाम 


प्रभु ,आप की लीला आप ही जानो ,
में जानुं सिर्फ सेवा का नाम ,
जो मन हो जाए दो दे दीजो 
मुझे अपनी चरण सेवा का काम 


इस बेबसी की जिन्दगी में करू क्या ?
नहीं लूँ अगर तेरा नाम ,जीयू क्या ?

मरना मंजूर  नहीं तेरी आँखों को ,मेरे राम !
जी जाने को ,नयी चेतना को जगाने का देते हो जो ज्ञान ,मेरे राम !

 हर ज्ञान स्वीकार ,करू धारण में शिरो धार्य ,
 देखू नित में आकाश , करू याद सूर्य प्रणाम |

मुझे भी शक्ति दीजो ,ज्ञान दीजो बस ये ही मांगू |

अनुभूति