मंगलवार, 24 मई 2011

मेरे श्रीहरी

इस संसार से परे,
जिस दुनिया में बसे हो
मेरे श्रीहरी  !
मेरे ईश्वरतुझे पुकारती हैं,

मेरी विदीर्ण आत्मा ,
कँहा हैं प्रभु !अब तो सुन , 
कभी तो इस धरती पे आके भी देख
में पुकार सकती हूँ तुम्हे केवल ,
नहीं बैठ  सकती तेरी साधना में ,
नहीं कर सकती कोई आरधना.
येआत्मा
में नहीं चढ़ा सकी में 
अपनी आत्मा का ये,
मलिन पुष्प तेरे चरणों में 
कितना कुछ सहेज रखा था मेने 
तेरी साधना के साथ ,
इस जीवन को तपोवन बना की थी,
मेने तेरी भक्ति 
ईश्वर तुने एक ही पल में ,
मुझसे छीन लिया मेरा सब कुछ ,
मेरे राम में सीता नहीं थी ,
कभी में तो अहिल्या भी न बन सकी ,
केसे में कर सकुंगी  सामना खुद का ,
किस गंगाजल से धो के कर सकुंगी 
अपने को पवित्र ,
इस जनम में कभी नहीं अब |
आसुंओं से धुल जाता तो में धो भी लेती 
ये नहीं धुल सकता कभी किस अमृत से भी अब .
अनुभूति 


दमन

तुम्हारी वो क्रूर बड़ी -बड़ी आँखे घुर रही थी उसे ,
समझ ही नहीं पायी वो तुम्हरा अंदेशा ,
कितनी भूख सिमटी हैं पुरुष
तुम्हारे अंतस में तन की ,
कितनी ही रातों तुमने किया हैं'
पत्नी के साथ भी बलात्कार ,
और दिन  में किया हैं
उसकी भावनाओं का दमन 
तुमने उसके मासूम हृदय पर कभी नहीं रखा ,
अपने स्नेह का हाथ ,
अपने स्वार्थ के लिए ,
सदा तुम खेलते रहे उसकी भावनाओं से ,
और बदले में दे दिया करते हो सहानुभूतियों का नाम ,
स्नेह के बदले भी तुम सहानुभूति उसके नाम करते हो ,
और अपनी आत्मा के सत्य से छिपाकर,
ये तोहमत उसके नाम करते हो ,
तन ,मन आत्मा हार चुकी होती हैं जब ,
एक पल में तब झटक लिया करते हो अपना दामन ,
हर फेसला तो तुम ही करते हो ,
उसका जिस्म ही सबसे बड़ी खूबसूरती  होता हैं न पुरुष !
तुम्हारे लिए .
 क्यों नहीं सालों साथ रहने के बाद भी,
झाँक नहीं पाते उसकी आत्मा में ?
तन तक ही क्यों सिमटी रह जाती हैं तुम्हारी भूख !
और छोड़ जाते हो उसकी देह पर अपनी वासनाओं के निशान,
निशान तो समय मिटा देता हैं ,
लेकिन आत्मा पे लगे जख्म,
सहानुभूति बन कर हमेशा हरे रहते हैं |
"अनुभूति "

ईश्वर की सबसे अनुपम कृति

"नारी ईश्वर की सबसे अनुपम कृति हैं |"
शायद किसी पुरुष ने ही लिखा होगा ,
और इस अनुपम कृति का सबसे ज्यादा ,
तिरस्कार , उपभोग और दुर्दशा भी उसी पुरुष ने की हैं |

ईश्वर तुमने तो बनाया उसे स्नेह ,समर्पण 
और त्याग की मूरत ,
तुमने एक मिटटी की गुड़ियाँ को बना
कर उसमे डाल दिए ,
इतने सारे गुणों के प्राण ,और खड़ा कर दिया 
संवेदहीन पुरषों के बीच 
,कभी माँ ,कभी बेटी कभी पत्नी ,
और कभी प्रेयसी बनाकर ,
तुमको थोड़ी भी दया नहीं आई ईश्वर!
तुमने पुरुष की सारी कमजोरियों का जिम्मेदार ,
उसे ही बना दिया सदा एक पल में ,

तुम ही ने तो एक पल में कहलवाया 
"नारी तुम श्रद्धा हो |"
और एक तरफ त्रिया चरित्र का कलंक ,

कोई भी उस माटी की गुड़ियाँ के अंतस में उतरकर
समझ पाया उसकी मासूमियत को ,
उसकी नाजुक सी अन्दर ही अन्दर दम तोडती मुस्कुराहट को |

अनुभूति