शनिवार, 21 मई 2011

चाँद से मिलने की ख्वाहिश !

एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की ख्वाहिश  हैं बस | 
और में उस शांत सरोवर के किनारे बैठ ,
अपने चाँद को उस शांत नीर में देख कर लेती हूँ ,
घंटो तुमसे बाते ,
मेरे चाँद !
तुम उतने ही खामोश होकर मुझे सदा सुनते ही रहते हो ,
और ख़ामोशी से मेरी तरफ देख बस ,
एक मीठी सी मुस्कुराहट दे देते हो 
जेसे कह रहे हो" पागल "
तुम नहीं करते मुझसे कभी कोई शिकायत , मेरी तरह 
कितना बोलती हूँ ,सोचते होंगे न तुम भी मेरे चाँद !
जब शिकायत करते -करते झरने लगती हैं,
मेरी आँखों से तुम्हारी चांदनी 
वो मोती उसी शांत नीर में मिलकर ,
पहुँचा देते हैं मेरे मन की वेदना को ,
आत्मा की तड़प को तुम तक,
मेरे चाँद !
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की ख्वाहिश  हैं बस | 
वो नहीं जानना चाहता हैं किसी मज़बूरी को 
नहीं समझना चाहता हालात और कोई परिस्थिति ,
वो तो तुम्हे बस अपना मान 
इन आँखों से बहाता हैं तुम्हारे स्नेह की चांदनी ,
पूर्णिमा के दिन जब पूरा होता हैं चाँद 
तुम्हरा स्नेह" समन्दर " मेरे नाम लिखा होता है,
और तुम्हारे स्नेह से वशीभूत मेरी आँखे,
तुम्हे उस शांत नीर में एक टक देखती रहती हैं ,
अपने आप से लजाती हैं
वो तुम्हारी आत्म आनंद अनुभूतियों में ,
वो एक टक देखती हैं 
तुम्हारी उस स्नेहमयी  विशालता को ,
उस विशाल ह्रदय को जिसके तुम स्वामी हो,
मेरे चाँद !
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा  मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की खाहिश हैं बस | 
तुम्हारे उस स्नेह की चांदनी को अपना माने बैठी हूँ ,
वो तो सिर्फ सहानुभूति हैं न ,
स्नेह नहीं तुम्हरा 
मेरे चाँद!
तुम्हारी तरह विशाल ह्रदय की स्वामिनी  कँहा मैं,
जो लुटा सकूँ इतनी शीतल चांदनी ,
हर विदीर्ण मन के लिए ,
इसीलिए तो तुम सुमद्र हो स्नेह का .
अन्नत हो , विशाल हो ,हर किसी की श्रद्धा हो .
में तो तुमसे जीवन भर ,
यूँ ही शांत नीर किनारे करती रहूंगी  बाते 
और तुम्हारी  बंधिनी मान अपने को
लुटाती रहूंगी तुम्हारे स्नेह की चांदनी 
इन आँखों से .
मेरा विशवास जब तक जीवित हैं  ,
में करती रहूंगी तुमसे बाते यूँ ही |
एक मासूम बच्चे की तरह जिद कर बैठा हैं बावरा मन ,
उसे बस अपने चाँद से मिलने की खवाहिश हैं बस  | 
अनुभूति

कित हो अंतर ध्यान !

मेरे गिरिधर गोपाल ,

कित हो अंतर ध्यान ,
राधा ढूंढे तुम्हारे संग को , 
खोजती फिर रही घट -घट|
तुम्हरे अधरों की वो मधुर मुस्कान |
श्याम -सलोना सरल रूप तुम्हरा 
हो तीनों  लोको के नाथ फिर  भी खड़े रहो हो सदा
दुखी , अबला ,असाहायों के साथ ,
तुम्हारी ये सरल छबी देख ,
मीरा भी हो गयी दासी 
और हँसते - हँसते पी गयी , 
विष प्याला मनमानी ,
मीरा नहीं तोड़े अपनी सीमा 
तुम्ही चले आओ सीमाओं  को तोड़ कर प्रभु !
और कर दो जीवन को एक पल देकर 
चरण सेवा का अधिकार .
एक बार , एक पल में जीवन हो जाएगा 
धन्य ,कृतार्थ और सदा के ,
लिए आप के श्री चरणों से अंकित
अपने श्याम की
अनुभूति