बुधवार, 11 मई 2011

अक्ष्णु विशवास मेरे राम ,

मेरा सत्य, मेरे राम!
मेरा जीवन, मेरे राम !
मेरी भक्ति ,मेरे राम !
मेरा रोम- रोम मेरे राम !
आप सी शुरू होके , 
प्रभु !मेरा जीवन भी हैं 
आप की चरण सेवा के  नाम |
में गर्वित हूँ आप का आशीष
आप का आलोकिक सेन्ह पाके
इस मस्तक पर सजा रहेगा सदा 
बनके जीवन का सोभाग्य ,सम्मान |
कही दुखी नहीं में आप को पाके ,
सबको खोने का डर , 
पर आप तो आत्मा के स्वामी
हैं , मेरे नाथ !
ये देह , ये नाते सब मिथ्या भ्रम जीवन के 
आप ही से सीखती आई हूँ |
जीवन  का बदला मार्ग तो साथ सदा 
आप की छाया पायी हूँ |
कोई ग्लानी नहीं , गर्व नहीं मुझे 
मुझे गर्व हैं ,मेरे साथ हैं तेरे राम
का अक्ष्णु विशवास |
इससे ज्यादा की कोई सोच नहीं जीवन की 
प्रभु जँहा भी हो ,
उस लोक से इस लोक तक उठाते रहो सदा 
अपने स्नेह ,आशीष और ज्ञान का हाथ |
जीने को सपने दिए हैं जब आप ने 
फिर केसे में कुछ कर जाऊ ?
आप का ये ही आदेश हैं तो में 
अपने को मिटा कर भी ,
प्रभु !
तेरी आँखों के स्वप्न सभी पूर्ण कर जाऊ
मुझे समझ नहीं आई दुनिया सारी ,
समझ आई इस संसार में विरले मन की
सरलता आप की मेरे राम !
मेरे जेसा , मेरा प्रभु !
उतना सच्चा , उतना सरल
तो हम अलग कँहा |
मेरा प्रभु ! तो बसा  हैं मेरी आत्मा में ,
में बसी हूँ आप की आत्मा के किसी कोने में ,
ये कोना ही कम हैं क्या इस अभागे जीवन में |
बस देना मुझे अपनी चरण सेवा का अधिकार 
ताकि कट जाए ये जीवन ,ऋण सारे उतार |
और में पा जाऊं , 
अगले जनम में सिर्फ तेरी भक्ति करने का सम्मान |
देना आशीष कर सकूँ संकल्प
सारे पुरे जीवन के |
मुझे बस तेरे विशवास की शक्ति भरी पड़ी हैं |
यूँही  कर विशवास सदा मुझे अशिश्ते रहो 
मेरे नाथ !

प्रभु! आप के चरणों में आप की 
अनुभूति