शनिवार, 7 मई 2011

ओ साथिया

ओ साथिया कहूँ क्या ?
सुनलो इन आँखों से ज़रा
ये मोती हैं तुम्हारी दी खुशियों के 
जिन्दगी को एक राह दी हैं |
धडकनों को एक नया साज |
क्या हैं पूछ तो लो ?
बस तुम्हारी गुनगुनाती हुई वो मुस्कुराहट
जो सुने अब तो एक अरसा बीत गया |
फिर भी गूंजती हैं वो कानो में आज भी ,
आप का वो "तुम "
आज भी मेरी जान पे भारी हैं |
झूम जाऊ में ख़ुशी से आज भी जब कानो में मिश्री 
सपनो में ही घुल जाए |
साथ हैं बस आप की दिव्यानंद अनुभूति 
कुछ नहीं तो सपनो में मुस्काऊं 
अनुभूति



हे जगदीश्वर !


हे जगदीश्वर !
मेरे राम 
हजारो बार टूटी हूँ 
और बिखर के फिर जुडी हूँ
क्योकि मेरे कण-कण में सदा से तुम बसे हो ,
तुम्हारे निराकार रूप को देखा नहीं मेने 
प्रत्यक्ष देखने की चाह में जीवित  हूँ |

मेरे रोम -रोम के स्वामी , 
जगदीश्वर  मेरे पालनहार 
मेरे रक्षक भी तुम ही
और जो कामदेव बनके,
जीवन में आये वो भी तुम ही
हर साकार ,निराकार रूप में मेरे चारो और तुम ही हो 
मुझे नहीं चाहियें इस दुनिया के लोग 
झूठ औ र बनावट 
तेरी निस्वार्थ भक्ति और स्नेह 
और सहानुभूतियों में ही में जी सकती हूँ |
हे जगदीश्वर |
"अनुभूति "