शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ममता

ओ कान्हा !
सुनी  पड़ी हैं ममता मेरी ,सूना पडा वात्सल्य ,
सुन लो अपनी पगली की, अब तो कोई करुण  पुकार |

तरस -तरस अब तो तृष्णा ,भी शांत हो गयी हैं ,
ये सोच के सपनो में ही ,खुश हो लेती हूँ
के मेरे आंचल में भी हैं 
तुमसा कोई रूप सलोना ,नन्हा
कृष्णा  !
इस नारी की प्यास कब बुझाओगे ,
मुझे माँ कहने वाला ,कब मेरे आंचल में लाओगे |
देख किसी का  नन्हा रो पड़ती हूँ हर बार 
हर बार छिप के रो लेती हूँ |
इस बार सामने तुम्हारे फट पड़ी  हैं ,
ये विदीर्ण आत्मा मेरी|
ओ कान्हा !अब मत तरसाओ ,
अब मत तड़पाओ 
न लो इस पगली से अब कोई अग्नि परीक्षा 
क्यों हर परीक्षा को मेरी ही नियति तुमने बना डाला ?
मेरे जीवन से तुमने नारी होने का ये सुख भी मिटा डाला 
प्रभु अब तो मुझपे तरस खाओ 
बन के वात्सल्य की घटा अब तो मेरे आँगन  भी बरस जाओ
अब नहीं होती मुझसे कोई परीक्षा सहन 
मुझमे सामर्थ्य  नहीं रहा अब तुझसे लड़ने का 
हारी बेठी हूँ तुम्हारे इन श्री चरणों में
प्रभु !
इस तन्हाई में मुझे भी ,कोई अपना दे जाओ 
एक बार ,बस एक बार ,मेरे आंचल को भी अपने स्नेह से भर जाओ |

न माँगा तुमसे कभी कुछ आज मांगती हूँ इन हाथो  को जोड़ तुमसे करू करुण पुकार .........
ओ कान्हा !चले आओ चले आओ इस पगली के द्वार |

कोई नहीं अपना मेरा 
दे दो अपनी ही खून की बूंदों से मुझे मेरा अस्त्तिव ,
जिसे मुझसे कोई न छीन सके  सके मुझे वो मेरा अपना
हां मेरा अपना |

कँहा कमी हैं मेरी भक्ति में ये बतलादो
या तो मुझे मेरा अपना कान्हा मिलवा दो
और नहीं ये मेरे लिए तो मुझे अपने चरणों में बुला लो |

मेरे कान्हा !तुम्हारी पगली अनुभूति




तेरी इबादत

गुनगुनाती हवा थमी पड़ी हैं ,
सब कुछ होकर भी जिन्दगी बेनूर सी पड़ी हैं|

खवाब  जो दिखा दिए तुमने इन सुनी आँखों को 
हर पल बेताब पड़ी हैं जिन्दगी उन्हें पूरा करने को|

अपने आप से ही ये कशमकश क्यूँ हैं ?
मुझे तुझसे इतनी मुहब्बत क्यों हैं ?

सोच- सोच के ही मिटी जा रही हूँ में 
अब केसे कहू तुझसे की हँस के जिए जा रही हूँ में |

दूर रह के भी तुझसे बाबस्ता हूँ में ,
ये महज इतिफ्फाक हैं
या कोई नया नासूर  हैं |

जिदगी क्यों हर पल नया इम्तिहान लिए जाती हैं ,
सामने खड़ी  हूँ तेरे, फिर भी क्यों तिल-तिल  मुझे ये मारी जाती हैं |

केसे कह दूँ की महोब्बत नहीं तुझसे मेरे मसीहा ,
ये आग हैं तो भी में मर के जिए जाती हूँ कुछ इस तरह |


तुझसे दूर रहकर ही तेरी इबादत करना मेरा नसीब हैं ,
ये सोच कर ही तेरी बंदगी हँस के किये जाती हूँ |


मिलेगा सुकून उन बाहों का मेरे हमदम 
ये यकी  नहीं मुझको मेरे सनम |
तुम पे यकीं हैं पर किस्मत से डरती हूँ 
कही कोई शिकन ना आ जाए तेरे चेहरे पे ,

मेरी मुहब्बत से ये सोच के ही
खामोश रह के दूर से इबादत करती हूँ |



अनुभूति 

लहर

स्नेह अद्भुत अनुपम तुम्हारा 
रोते -रोते भी छोड़ जाए जो
मुस्कुराहट इन लबो पे 

एक पल में घटा बन के छा जाएँ 
इस प्यासी जिन्दगी पे ,
भीग जाऊ में अपने अंतस से 
कर तुम्हारी आत्मआनंद अनुभूति 
लहर बन के हवा के साथ  बिखर जाऊ 
और छू लू तुम्हारे सपनो का आकाश
बस ये ही अनुभूति हैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई |