मंगलवार, 29 नवंबर 2011

काहे इतना स्नेह बरसाते हो

मेरे राम !
काहे इतना स्नेह बरसाते हो 
इस अभागी पे 
जो ना जाने इसका मोल
उसे काहे दिए जाते हो 
में पगली जीवन दे भी न चुका सकूँ 
तेरी प्रीत की कीमत अनमोल
ले चल मुझे संग अपने 
बना ले मुझे भी अपने संग अपने सा 
या मिटा दे इस जीवन 
को ,दे अपना क्षणिक दे आवेश 
तू ना जाने ,
मेरे मन की थाह 
 तेरे कदमो के सिवा कोई अब न रही चाह
श्री चरणों में तुम्हारी अनु



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