गुरुवार, 10 नवंबर 2011

मेरे चाँद !

मेरे चाँद !
कभी तो हो के तेरे पहलु में आके में जी भर के रो सकू .
कह सकू तुझसे कुछ ,समझा सकू रूह की तड़प 
पर तुझसे अपनी खिड़की से
बतियाते -बतियाते में भूल ही जाती हूँ 
तुम तो दूर खड़े हो उस आसमान पे 
और में  तो तेरी चांदनी को तरसता एक फुल 
लगता हैं तेरे इन्तजार में ,
सदिया युही बीत जायेंगी 
रोते -रोते 
और तू खामोश उस आसमान से 
अपने ही गुरुर में इतराता होगा 
सोचती हूँ कहूँ तुझसे की एक तड़प तुझे भी ऐसी हो जिसकी आह,
किसी दिल की दीवारों से न टकराए 
दिल तो कह भी दे ,
रूह को ये मजूर भी नहीं 
 मरना ,मिटना ही जिन्दगी हैं 
खता कह लो या गुनाह ये तो मेने किया हैं
इसलिए हँस के सब कुछ अपने नाम कर लिया हैं |
हां फिर भी ये  पगली
अपने खामोश चाँद से आज भी घंटो किया करती हैं बाते 
और तेरी चांदनी से भिगोती रहती हैं तकिया
और कहती हैं तुमसे 
कोई दिन तो हो ऐसा
की में तेरे धवल पहलु में आके रो सकूँ |
श्री  चरणों में तुम्हारी अनु










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