सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

मेरे हमदम !



मेरे हमदम !
अल्फाज नहीं रुकते ,
समन्दर फुट पडा हैं मुस्कुराहटों का

तुम मुझसे लाख दूर ही सही ।
लेकिन में सिमटी बेठी हूँ

तुम्हारी मिलो दूर से आने वाली सुरभि में

में जानती हूँ तुम कहते कुछ नहीं

मुकुराते हो बस ,
काहे इन मुस्कुराहटों से मुझे यूँ सताते हो
केसी अनोखी प्रीत हैं प्रियतम
दूर हो लेकिन मुझमे ही मुज्सम हो जाते हो !
खुदा ने मुझे,
सिर्फ तुम्हारी खामोशियों को पढ़ना

और तुम्हारी धडकनों को सुनना ही सिखाया हैं

और में खिली पड़ी हूँ,
तुम्हारी असीम चांदनी में

जो बंद हो जाएँ कमल में भँवरा
मुझमे बसे हो तुम
मेरे अंतस के स्वामी ।
अनुभूति

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