सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

तुम्हारी मासूम चाहत


सोचती
हूँ तुम्हे और देखती हूँ
तुम्हारी मासूम चाहत

अपने हमदम की साँसों में ,
तुम्हारे
असीम स्नेह की खुशबु
तो लगता हैं तुमसी खुशनसीब तक़दीर किसी और की नहीं होगी
तुम साथ नाम ही के नहीं बस
पर मेरे हमदम की हर सांस में तुम धडकती हो
वो हँसता हैं ,तो फुल बनकर तुम झरती हो
वो तेरा नाम जो लेता हैं रोता हैं
जा क्योकि उसके हर अश्क में आज भी तुम्हरा ही चेहरा होता हैं
सोचती हूँ दर्द प्यार करने वालों के नाम ही क्यों होता हैं ?
मिलन क्यों नहीं होता ,तकलीफ ,दर्द आंसू और तन्हाई
ये ही क्यों इनाम होता हैं
शिकायत हैं मुझे खुदा तुझसे
जब मिलना ही नहीं हैं तो साथ क्यों लाया !
नहीं जानती में तुमसे कभी रूबरू हो सकुंगी
हां लेकिन हर सांस हर धडकन
में तुम्हारी चाहत से रोज मिलती हूँ
और वादा करती हूँ तुम सदा यूँ ही महकती रहोगी
मेरे हमदम की साँसों में एक अमिट खुशबु की तरह
अनुभूति


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