रविवार, 2 अक्तूबर 2011

मेरे माधव ! तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया


तेरी तस्वीर से बड़ा कोई दुसरा कोई भ्रम नहीं ,
तू तो एक छाया हैं जो बसी हैं रूह में बनके एक सांस
लाख जिदंगी को दूर करना चाहूँ में ,
तो भी तुम धर के अपने अधरों पे,
अपने मीठे शब्दों की मुरलिया
मुझे छल जाते हो ,
कृष्णा !
तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया
कब कीस घडी कोनसा रूप धर जाओं तुम ही जानो
मेरे माधव !
तुम्हारे ये रूप कभी -कभी बावरे मन को दे जाते हैं पीड़ा
जो कही जा सके ,
सही जा सके सांसो के उठते दर्द के साथ
बस हैं तब तक थामे बेठी हूँ अपने को इस झूठे संसार में
घुटती हूँ ,तड़पती हूँ ,अपने ही अंतस से तुम्हे खोजा करती हूँ
मेरी दुनिया में हर पल तुमसे ही बतियाती हूँ
जीती हूँ हर घडी ,फिर भी तुमसे कभी मिल पाने की आस में
हर लम्हा मरती जाती हूँ
ये केसा जीवन हैं मेरे गोविन्द !
समझ नहीं आये !
क्यों चाह नहीं मुझे संसार की अब
क्यों में जाना चाहूँ बैकुंठ तुम्हारे चरणों के धाम
क्या सच हैं क्या मिथ्या
ये तुम ही जानो
मुझे नहीं आये तुम्हारी तरह छलना
में तो सोप चुकी हु अपने हर अहसास में
ये जीवन अधिकार
जो गहरा हैं इस इस तन की परिभाषा से कोसों दूर
तुम संसार के स्वामी भूले हो
और में भूली हूँ तुममे में अपने को

अगर तुम ही भ्रम हो झूठ हो ,
तो इस संसार में कीस पे करू विशवास
मेरे राम !
मेरे माधव !

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