शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

रसात्मिका



रसात्मिका

तेरी पनाहों में जिंदगी दर्द भूल जाती हैं ,

दे जाती हैं कुछ पल अमिट स्मृतियों को

मैं आत्म विभोर हूं .....................

तेरी रहमतों से मेरे माधव !

तेरी इन सुकून भरी स्नेह की चांदनी में

में खिलती हूं जो चाँद खिला हो अमावस

तुम्हारा असीम स्नेह फूटता रहता हैं मेरी रूह से

इस आत्मा से निकले शब्दों से ......................

हां ,इसीलिए तो हूं

और तुम कहते हो मुझे रसात्मिका

मैं हूं !

तुम्हारी रसात्मिका ......................................

श्री चरणों में अनुभूति

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

में रूठी हूँ तुझसे ही आज


मेरे कृष्णा !
में रूठी हूँ तुझसे ही आज ....
सब कुछ एक ही पल में छीन लिया तुमने मुझसे
मेरी आत्मा ,मेरे शब्द ,मेरे अहसास ,
मेरा स्नेह सागर
मेरी आत्म आनंद अनुभूतियाँ ...............
फिर भी जाने क्यों लगता हैं मुझे
सुन रहे हो मुझे ,देख रहे हो
महसूस कर रहे हो मेरी हर पीड़ा को
और धडक रहे हो मुझमे ही .............
चीर दिया हैं तुमने मेरी आत्मा का अंतस
अब इन आखो से अश्क नहीं ,दर्द फूटता हैं
और पल -पल तुम्हारे कदमो पे गिरता हुआ
तुम्हे पुकारता हैं मेरे माधव ......................
जीवन का कोनसा रूप दिखा रहे हो तुम ,
कोनसी नयी सीख दे रहे हो
मुझे मेरे श्याम ......
मेरे कोस्तुभ धारी रूठी हैं तुमसे आज
तुम्हारी ये बावरी,पुकारती है तुम्हे
चले आओ मेरे माधव ............
अनुभूति




तुम याद आते हो !


ढलते हैं अश्क इन आँखों से,
जब तुम्हारे कदमो पे
मुझे तुम याद आते हो ,
इस दुनिया से जुदा हो तुम ,
जाने क्यों अहसास दिला जाते हो
तुम कहते थे
मुझे मेरे शब्दों में मेरी आत्मा फूटती हैं
नहीं इन से तुम फुट पड़ते हो
हां जब मेरा अंतस चीर जाता हैं
जब तुम याद आते हो
कँहा खोगये हो मेरे कृष्णा !
तुम मुझसे इस दुनिया की भीड़ में
किसे पुकारू
मेरे माधव !
तुम ही तो हो जो बसे हो मेरे रोम -रोम
हां फुट पड़ती हैं आँखे
आज भी जब तुम याद आते हो
श्री चरणों में अनुभूति

मेरी ये इबादत हैं ये मुझे पता हैं ,

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

खुदा


जो किसी दिल में आह हो ,
आँखोंमें किसी के अश्क हो
समझो लो तुम्हारा खुदा
तुम्हारे सामने खड़ा हैं !
अनुभूति


सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

तुम्हारी मासूम चाहत


सोचती
हूँ तुम्हे और देखती हूँ
तुम्हारी मासूम चाहत

अपने हमदम की साँसों में ,
तुम्हारे
असीम स्नेह की खुशबु
तो लगता हैं तुमसी खुशनसीब तक़दीर किसी और की नहीं होगी
तुम साथ नाम ही के नहीं बस
पर मेरे हमदम की हर सांस में तुम धडकती हो
वो हँसता हैं ,तो फुल बनकर तुम झरती हो
वो तेरा नाम जो लेता हैं रोता हैं
जा क्योकि उसके हर अश्क में आज भी तुम्हरा ही चेहरा होता हैं
सोचती हूँ दर्द प्यार करने वालों के नाम ही क्यों होता हैं ?
मिलन क्यों नहीं होता ,तकलीफ ,दर्द आंसू और तन्हाई
ये ही क्यों इनाम होता हैं
शिकायत हैं मुझे खुदा तुझसे
जब मिलना ही नहीं हैं तो साथ क्यों लाया !
नहीं जानती में तुमसे कभी रूबरू हो सकुंगी
हां लेकिन हर सांस हर धडकन
में तुम्हारी चाहत से रोज मिलती हूँ
और वादा करती हूँ तुम सदा यूँ ही महकती रहोगी
मेरे हमदम की साँसों में एक अमिट खुशबु की तरह
अनुभूति


तेरे नाम


तेरे नाम ने यूँ सिखाई हमको जिन्दगी से वफ़ा .
की दिल को धडकना आ गया ,
यूँ चुपके से तुम दिल के आँगन में कब उतर पड़े
पायलो की खनक को पता भी न चला
की अब वो छम -छम भी तुम्हारे नाम से करती हैं ,
हाथो की कलाई में खनकती हैं
तुम्हारी एक -एक धडकन की तरह एक -एक चूड़ी ,
सजती हैं सुर्ख रंग में मेहंदी ,
केसे कहू मेरे हमदम ने जीती हूँ
तेरी
रूह की पाकीजगी के दम से

तुम्हारे दर्द से कब मेने अपने जोड़ लिए रिश्ते
ये अपनी रूह पे पड़ती चोट को भी न चला पता
वो तो जब तेरे आसुओं की आह ने जब चीर दिया मुझे
मुझे अपनी ही तरह उठते तेरी रूह के दर्द का पता चला
तुझपे कब निसार हो गयी में तेरी रूह के दर्द की आगोश में
मुझे पता भी न चला
अब हालत हें ये दिल की
तेरे दीदार की एक बार चाहत में
वो करती हैं सोलह सिंगार
सजते -सजते जब झड जाती हें काँच की कोई चूड़ी
और बह उठता हैं लहू तो उससे उठते तेज दर्द से चलता हैं
तेरी हुकूमत का मुझपे पता ,
मेरे खुदा !
मेरे हमदम की साँसों को यूँ ही सलामत रख ,
क्योकि
वो न रहा तो में भी न रहूंगी
और तुझे मेरे अहसासों का मेरी बंदगी का
तुझे मेरे शब्दों से भी न चलेगा पता
की तुझसे भी ज्यादा कोई
अपने हमदम की करता हैं बंदगी
या खुदा मुझे माफ़ करना में जानती हूँ
जन्नत मुझे नसीब न होगी

क्योकि में तेरी ही आँखों के सामने करती हूँ
अपने महबूब के कदमो में नमाज अदा
मेने न पाया न देखा हैं
उस धवल पाकीजा रूह की तरह कोई साया
मेरे खुदा मुझे,तू मुझमे. मेरा हमदम होकर
मेरा खुदा बनकर मुझमे कब समा गया मुझे पता भी न चला

मेरे हमदम !



मेरे हमदम !
अल्फाज नहीं रुकते ,
समन्दर फुट पडा हैं मुस्कुराहटों का

तुम मुझसे लाख दूर ही सही ।
लेकिन में सिमटी बेठी हूँ

तुम्हारी मिलो दूर से आने वाली सुरभि में

में जानती हूँ तुम कहते कुछ नहीं

मुकुराते हो बस ,
काहे इन मुस्कुराहटों से मुझे यूँ सताते हो
केसी अनोखी प्रीत हैं प्रियतम
दूर हो लेकिन मुझमे ही मुज्सम हो जाते हो !
खुदा ने मुझे,
सिर्फ तुम्हारी खामोशियों को पढ़ना

और तुम्हारी धडकनों को सुनना ही सिखाया हैं

और में खिली पड़ी हूँ,
तुम्हारी असीम चांदनी में

जो बंद हो जाएँ कमल में भँवरा
मुझमे बसे हो तुम
मेरे अंतस के स्वामी ।
अनुभूति

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

या खुदा , ये तेरी कैसी नवाजिश हैं मुझपे !


मेरे महबूब !
लगता हैं मेरे खुदा को भी मुझपे रहम आ गया
वो आज तेरा रूप धरकर , मेरे सामने चला आया

या खुदा !
ये तेरी कैसी नवाजिश हैं मुझपे

इतनि तड़प को तू एक पल में यूँ बुझा गया

धडक उठा है दिल ,धडकने लगी हैं आज रूह

मेरे खुदा !
अब तो तू मुझे मौत भी दे दे

तो कोई शिकयत न होगी

हां मरते वक्त तू यूँही मेरे सामने खड़ा रहना

जिन्दगी में मेरे खुदा तेरी इससे बड़ी कोई नवाजिश न होगी

मेरे खुदा !
लगता हैं आज महीनो बाद मेरा चाँद बादलों की ओट से निकल आया हैं

और में लूटा रही हूँ पागलो की तरह अपनी आँखों से तेरे स्नेह समन्दर के मोती
हां बिलकुल तुझसी हूँ में मेरे महबूब


अनुभूति

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

एक खुबसूरत ख्याल




ये हवाएं तुम्हारी ही तरह खामोशी से सब कुछ कह जाती हैं 
हां तुम मेरे आसपास हो, न हो 
ये मुझे तेरी रूह की पाकीजगी का ,
तेरी आँखों से ढलते अश्को का
तेरी असीम चाहत का अहसास करा जाती हैं .
में नहीं जानती तुम सच हो या 
एक खुबसूरत ख्वाब
जो भी हो जेसे भी हो 
मेरे हमनवस !
में तुम्हे  दुनिया से दूर अपनी आत्मा में छिपायें 
जीती जाती हूँ ,
तुम्हारे लिए जीती हूँ !
बनती हूँ  !
सजती हूँ !
खनकती हूँ !
सवरती हूँ !
और अपने ही आप से,
तुम्हारी आँखों  से शर्माती हूँ 
अपने ही आसपास के किस कोने में तिरछी निगाहों से 
देखता में तुम्हे पाती हूँ 
में जानती हूँ तुम कही नहीं हो ,
फिर भी में तुम्हारे ख्यालो में जीती जाती हूँ 
सोचती हूँ तुम कहोगे अनु 
कितना बोलती हूँ 
,कभी तो खामोश रहो ,
में तुम्हे बिना बोले भी हर सांस
तुम्हारी इन आखों से पद लेता हूँ
हां जानती हूँ में तुम
बस कुछ लम्हा,
अपने ही आप से चोरी किये लम्हों का
एक खुबसूरत ख्याल हो तुम 
इंसानों की दुनिया के तुम नहीं लगते मुझे 
बस एक फ़रिश्ता नजर आया करते हो ,
जो मेरी ही तरह हैं अपने ही अंतस के दर्द से 
मुस्कुराते हुए लड़ता हुआ ,
बस मजबूत सा दिखता लेकिन 
आँखों से ढलते अश्को से अपने असीम स्नेह को 
बया करता ,
जी करता हैं उन आखों से  ढलता  सारा दर्द में पी जाऊं  
और सजा दू तुम्हारे लबों पे कभी न खतम होने वाली 
एक मुस्कराहट   
हां तुम्हरी इसी सरलता और सादगी की कायल हूँ 
और जानती हूँ तुम यंहा कही नहीं  ,कोई नहीं 
कोई नहीं मेरे 
हां मेरे ही अंतस का एक खुबसूरत ख्याल हो तुम
हां बस एक ख्याल 
अनुभूति



रविवार, 9 अक्तूबर 2011

खाहिश

मुझे न  आसमान की उड़ान की खाहिश हैं ,
चाँद, तारों की
बेबसी में इन आँखों से झरते आसुओं को
बस तेरे कदमो की इबादत की खाहिश हैं
साँस बन कर जो रूह में उतर गया हैं
जिदगी को बस उस खुदा के कदमो में बिछ जाने की खाहिश हैं
तेरी आँहो के दर्द और आँखों से गिरते अश्को की बंदगी की हैं मेने
बस इसीलिए तेरे कदमो पे लुट जाने की खाहिश हैं


मेरी उम्मीदों का आसमान नहीं बहुत बड़ा
इसलिए तेरी कायनात से अपने लिए
प्यार के चंद बूदों की खाहिश हैं


में जानती हूँ मिटना ही मेरी नियति हैं
हां में मिट जाऊं में तेरी एक मुस्कराहट पे
लुटा दूँ सदके में अपनी जान
बस जिन्दगी की ये ही खाहिश हैं


मेरी जन्दगी .,मेरी सांसे
सब कुछ तुझसे ही हैं रोशन
हां बस तुझे ,हँसते गुलशन में मुस्कुराते देखने की खाहिश हैं !


अनुभूति

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

मेरे अंतस के ईशु तुम ही तो हो ,

"मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा। "
बाईबिल
में दीवानी हूँ गीता की ,भागवत की और बाईबिल की कुरान की ,मेरे लिए हर शब्द ईश्वर का असीम स्नेह अमृत हैं जो आत्म विभोर होने पे मेरी आँखों से बरसता हैं ,मेरा मालिक मुझे हमेशा अपना हाथ बड़ा थामे रहता हैं और असीम वेदना में भी ये कहता हैं अनु तुम बड़ी चलो में तुम्हे थामे हूँ |उसका ये अद्भुत अहसास जब मेरी आत्मा से फूटता हैं तो मेरी इबादत बन जाता हैं | बस ये ही हैं रसात्मिका |



मेरे कण -कण में ,
रोम -रोम में ,मेरी हर सांस में
तुम ही तो बसे हो ,
चाहें में तुम्हे राम कह के पुकारूं ,
या कहू मुरलीवाला
.या रब के कह के आवाज लगा लूँ
मेरे अंतस के ईशु तुम ही तो हो ,
पुकारती हु न, तुम्हे तो रोती हूँ दिवानो सी
लडती भी हूँ
और तेरा छिपा लाड -दुलार आँखों से बरसाती भी हूँ
कितने सरल हो न तुम ये सोचती हूँ
संसार क्यानहीं करता हैं तुम्हे पाने को,
मनाने को
और तुम इस पगली की एक पुकार पे चले आते हो,
देख नहीं पाते तुम मुझे किसी दुःख में
मेरे हाल पे लोगो को दुःख हुआ करता हैं
और में ख़ुशी से रोती हूँ
उसे क्या पता मेरे पास तो खुद तुम खड़े हो
मुझे थामे हो

क्या मांगू में!
मुझसे बड़ा कोई नहीं किस्मतवाला
जिसे तुने अपनेआप को दे निहाल कर दिया
मेरे रब !
मेरे मसीहा!
मेरे राम !

आप के कदमो मेंयूँ ही बेठे रहूँ
अनुभूति






रविवार, 2 अक्तूबर 2011

मेरे माधव ! तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया


तेरी तस्वीर से बड़ा कोई दुसरा कोई भ्रम नहीं ,
तू तो एक छाया हैं जो बसी हैं रूह में बनके एक सांस
लाख जिदंगी को दूर करना चाहूँ में ,
तो भी तुम धर के अपने अधरों पे,
अपने मीठे शब्दों की मुरलिया
मुझे छल जाते हो ,
कृष्णा !
तुम इस संसार के सब से बड़े छलिया
कब कीस घडी कोनसा रूप धर जाओं तुम ही जानो
मेरे माधव !
तुम्हारे ये रूप कभी -कभी बावरे मन को दे जाते हैं पीड़ा
जो कही जा सके ,
सही जा सके सांसो के उठते दर्द के साथ
बस हैं तब तक थामे बेठी हूँ अपने को इस झूठे संसार में
घुटती हूँ ,तड़पती हूँ ,अपने ही अंतस से तुम्हे खोजा करती हूँ
मेरी दुनिया में हर पल तुमसे ही बतियाती हूँ
जीती हूँ हर घडी ,फिर भी तुमसे कभी मिल पाने की आस में
हर लम्हा मरती जाती हूँ
ये केसा जीवन हैं मेरे गोविन्द !
समझ नहीं आये !
क्यों चाह नहीं मुझे संसार की अब
क्यों में जाना चाहूँ बैकुंठ तुम्हारे चरणों के धाम
क्या सच हैं क्या मिथ्या
ये तुम ही जानो
मुझे नहीं आये तुम्हारी तरह छलना
में तो सोप चुकी हु अपने हर अहसास में
ये जीवन अधिकार
जो गहरा हैं इस इस तन की परिभाषा से कोसों दूर
तुम संसार के स्वामी भूले हो
और में भूली हूँ तुममे में अपने को

अगर तुम ही भ्रम हो झूठ हो ,
तो इस संसार में कीस पे करू विशवास
मेरे राम !
मेरे माधव !