मंगलवार, 27 सितंबर 2011

मेरे खुदा! ! तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता अभी बाकी हैं


न जाने कितने इम्तिहान तुम्हारे बाकी हैं ,
लगता नहीं किसी और बंधन में अब कोई अहसास बाकी है |
में नहीं जानती तुम कोंन सा फ़रिश्ता हो या खुदा हो मेरा
हां लेकिन तेरी रूह से मेरी रूह का रिश्ता ये ही अब जिन्दगी के नाम पे बाकी हैं |
देखा नहीं तुझे ,छुआ नहीं फिर भी तेरे सफ़ेद साए की

सरपरस्ती अभी बाकी हैं ,
तेरी रूह की चांदनी जब बरसती हैं

में अमावस में भी पूनम का तुम्हारा चाँद होती हूँ |
किसी मिलन ,किसी श्रंगार की

मुझे अब जरुरत नहीं ,मेरी रूह ,
तेरी रूह से मिलती हैं जब चांदनी रातो को ,
मुझपे आत्म आनंद अनुभूतियों की बरसात होती हैं |
तू जो एक निगाह उठाये उस आसमान को भी देख ले

में यंहा शर्म से सिहर जाती हूँ |
हां ज़िंदा हूँ में सिर्फ तेरे नाम से

ये ही सदा अब इबादत को अभी बाकी हैं |
अनुभूति

मेरा हर शब्द ,मेरे ईश्वर के लिए ,मेरे कृष्णा के लिए होता हैं जिसमे किसी इंसान के होने का कोईअस्तित्व ही नहीं ,
ये मेरा अनन्य स्नेह हैं जो सिर्फ अपने ईश्वर अपने आराध्य अपने राम ,अपने कृष्णा और जिस नाम से उसे पुकार लू मेरे खुदा या फ़रिश्ता के कदमो की इबादत है बस
अनुभूति

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