मंगलवार, 13 सितंबर 2011

बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं मेरे राम !




मेरे राम !
दर्द को अब दर्द नहीं होता ,
बस कभी -कभी तुम्हारे असीम अनुराग की चांदनी
इस पत्थर से फुट पड़ती हैं अशार बन कर ,
और में खुश होती हूँ
ये जान कर की तुम मेरी आत्मा में
आज भी बसे हो उतनी ही खूबसूरती के साथ
अपनी धवल आत्मा के साथ ,
मेरे पास मेरे राम ,
तुम्हरा वो मेरे आसुओं से भीगा दामन ,
जिन्दगी से लड़ने की हिम्मत देती वो मुस्कराहट
और तुम्हारे असीम स्नेह से
फूटे मेरी आत्मा से निकलते ये
शब्द ही मेरी निधि हैं सबसे बड़ी
मेरे राम !
मेरे जेसे न जानेकितने तुझे अपना आराध्य माने बेठे हैं
हां विरले ही मुझसा कोई होगा
जो तुम्हे इन साँसों का मालिक माने बेठा होगा
स्वार्थ की दुनिया से परे
में खुश हूँ तुम्हारे साए के
कदमो पे ही अपने आसुओं से
तुम्हे सदा नमन करके |
मेरे राम !
सदा यूँही अपनी निश्चल मुस्कुराहटो के साथ बसे रहना
इस पगली की आत्मा में बस
ये ही विनती हैं तुम्हारे चरणों में
कई बार सोचती हूँ निगाहें उठाऊं
और तुम्हारी इस अनुपम छबी को निहार लूँ
पर में जानती हूँ
में इस अनुपम संसार के दिव्य लोगो के सामने
एक तुच्छ इंसान हूँ
इसलिए देख नहीं सकी आज भी
तुम्हारे चरणों से ऊपर निगाहें उठाके
मुझे बस इन चरणों की सेवा
सदा जन्मो -जन्मान्तर देना !
लाख विपदा और कष्ट दे देना
मगर अपनी आत्मा से अपना स्नेह आशीष
मुझ पगली पे यूँ ही लुटाते रहना !
तुम सब कुछ जानते हो ये संसार नहीं मेरे नाम पे
बस तेरी ही आरधना मेरी निधि हैं
बस मुझे इस निधि से सदा सरोबार रखना
मेरे असीम स्नेह सागर ,
मेरे राम !
मेरे माधव भी तुम ही बने हो
और इस शरीर की अंतिम सांस भी
मेरे राम !
श्री चरणों में अनुभूति

कोई टिप्पणी नहीं: