शनिवार, 3 सितंबर 2011

जिन्दगी की अदा



मेरे खुदा !
वो कहता हैं मुझसे अभी तेरे और भी इम्तिहान बाकी हैं
तू ज़रा ठहर जा ,
जख्मों के लिए अभी तेरे दिल में और भी जगह बाकी हैं |


वो रोज अहसास बन कर उतरता हैं मुझमे ,
कुरआन की आयतों की तरह
पर उसे पता भी नहीं
वो उतरता हैं मुझमे पल -पल मेरे मरने के बाद
जीने के आस लिए जिन्दगी की तरह |


वो चाँद का घुंघट ,खनकती पायल
आज भी तडपती हैं ,
जिन्दगी की अदा लिए
असीम आत्म आनंद अनुभूतियों की तरह |
अनुभूति

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निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................