शनिवार, 13 अगस्त 2011

मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,मेरे कृष्णा !

अंधरे के बाद इस उदित होते इस
स्वर्णिम सूर्य की छटा हो तुम ,
मेरे कृष्णा !
मैं खोज रही थी ,
मिथ्या माटी के बुतों में तुम्हारा साकार रूप ,
पर तुम तो अनंत हो ,
दे जाते हो अपनी ही छाया तुम कभी -कभी दूसरों को
जगत की इस मिथ्या से दूर में पा जाती हूँ
एक मासूम बच्चे की निश्चल मुस्कराहट में
मुस्कुराते हुए तुम्हे कान्हा !
कितना अनुपम ,सरल रूप सलोना
तुम्हारा मेरे कृष्णा !
तुम्हारी छबी में खोजा करती थी ,
छायाओं में .परछाइयों में
पर तुम मुझे मिले हो मुझे हो साकार
इस उदित स्वर्णिम सूर्य की गहराइयों में
अंधरे के बाद का ये उजाला
मुझे एक दिन ले आयेगा तुम्हारे ही अंनत आकाश में ,
मेरा प्रणव ,
अंतिम सत्य
मेरा सब कुछ तुझमे ही हो जाएगा विलीन ,
में खुश हूँ प्रति पल ,
तुम तक जो बदती चलती हूँ
तुम्हारा ही अस्तित्व हूँ
और पल-पल तुममे ही खोती चलती हूँ
तुममे मेरे कृष्णा !
श्री चरणों में अनुभूति

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