सोमवार, 4 जुलाई 2011

मेरे कृष्णा ! तेरे असीम स्नेह का मधु

मेरे राम !
मेरे कृष्णा !
मेरी आँखों से अब टपकता हैं
तेरे असीम स्नेह का मधु ,
कितना अद्भुत और आलोकिक सुख हैं कृष्णा !
कभी नहीं जाना था तेरे स्नेह भक्ति सागर में डूबे बिना
आज जाना हैं तो रोम -रोम में बह उठता हैं
तेरा असीम स्नेह विशवास ,
कितने मीठे हैं ये आंसू भी मेरे कृष्णा !
ये जाने सिर्फ मेरी आत्मा  और तुम
में तुच्छ कर भी सकी कोई चाकरी
तेरी कृष्णा !
सामने एक बार ही आता हैं ईश्वर
अब जाना
मेरे कान्हा!
  में तो तुम्हे बसाए बेठी हूँ जाने कब से
कभी राम में बसे हो मेरे कभी मेरे कोस्तुभ स्वामी में
सदा तेरी दासी थी में तो कृष्णा !
संसार की लीला में भूले हो तुम
में भूली बेठी हूँ संसार
फर्क इतना हैं ही कन्हाई ,
पर इस संसार को ज्यादा जरुरत हैं
तुम्हारी कृष्णा !
जब दुनिया हो जाए पूरी तो एक क्षण मुझे भी दे
अपना स्नेह मुझे स्वीकार करना अपने चरणों में
मेरी भक्ति को
अनुभूति

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निकला था तेरी तलाश में भटकता ही रहा हुआ जो सामना एक दिन आईने से , पता चला तू तो ,कूचा ए दिल में कब से बस रहा ................