मंगलवार, 28 जून 2011

अर्थहीन हैं शब्द ,

मेरे कोस्तुभ धारी !
मेरे नीलकंठ !
मेरे राम !
बिन मोल बिकी हैं रूह मेरी ,शब्द मेरे ,
भक्ति में तुहारी
जो बंसी अधरों पे धरे ,
कृष्णा!
मुझे देख मुस्काएं हो तो हंसी हूँ में,
मुझे स्नेह किया हैं तो जी हूँ आतम आन्नद अनुभूतियों में तुहारी
जो मुझे देख गुस्सा दिखाए हो तो डरी हूँ में
कृष्णा ये इतने  रूप क्यों ?
जो अंतस में हैं वो भाहर क्यों नहीं दिखता
तेरी में और में तुम जानो कान्हा
में डूबी तेरी भक्ति में
क्या जानू संसार,
मांगू तुझसे ये झूठा ये संसार
जानू मेरी रूह से तेरी आत्मा का निस्वार्थ साथ
अभिभूत हूँ पाकर तेरी भक्ति
छीन लेना मुझसे अपनी भक्ति की ये शक्ति
कान्हा !
पता नहीं क्यों अर्थहीन  हैं शब्द ,
अर्थ हीन हो गया हैं जीवन
बस चलती चली हूँ
तुम्हारी राहों पे
बिना किसी स्नेह ,साथ और विशवास के
बंधी पड़ी हूँ तुहारे कदमो के बंधन
सारे संसार के लिए तो तुम दया के सागर
मेरे लिए क्यों कठोरता ओडे हो ?
कभी तो बादलो की ओट
से ही मुझसे पूछ लो
कह दो डरो नहीं में
तुम्हारे साथ सदा स्नेह ,आशीष बन कर खड़ा हूँ
क्या मांगू में और ?
चाहियें तुम बिन कोई भोर कान्हा !
अनुभूति

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